स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिचय एवं पृष्ठभूमि ५१
'सकल भुवनोदय स्थिति लयमय लीला विनोदुक्तः ।
अन्तर्लीन विमर्शः पातु महेशः प्रकाशमात्र तनुः ॥ (१)'
भेदात्मक दृष्टि से देखने पर प्रत्यभिज्ञा एवं स्पन्द में ३६ या ३७ तत्त्व स्वीकृत हैं
किन्तु ये सभी शिव-शक्ति के स्फार हैं ।
'शान्तब्रह्मवाद' एवं 'शिवाद्वयवाद'—शाङ्कर वेदान्त का निर्गुण, निराकार सृष्टि-
स्थिति-संहार आदि व्यापारों से रहित शान्त ब्रह्म स्पन्द एवं प्रत्यभिज्ञा को स्वीकार्य नहीं
है । वे 'शिवाद्वयवाद'—प्रतिपादक हैं ।
'शिव' और 'शक्ति'—प्रत्यभिज्ञा एवं स्पन्द का शिव पञ्चकृत्यकारी है—'स्पन्द-
कारिका' की प्रथम कारिका में इसी पक्ष की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा गया है—
'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां जगतः प्रलयोदयौ ।
तं शक्तिचक्रविभवप्रभवं शङ्करं स्तुमः ॥
इसके पाँच कार्य निम्नांकित हैं—१. सृष्टि, २. स्थिति, ३. संहार, ४. तिरोधान
एवं ५. अनुग्रह ।
(१) 'नमः शिवाय सततं पञ्चकृत्य विधायिने ।
चिदानन्दघनस्वात्म परमार्थविभासिने ।।' (प्रत्यभिज्ञाहृदयम्)
(२) 'सृष्टि संहार कर्तारं विलयस्थितिकारकम् ।
अनुग्रहकरं देवं प्रणतार्तिविनाशनम् ।। (स्वच्छन्दतन्त्र, प्र०पटल)
इसके अतिरिक्त १. आभासन, २. रक्ति, ३. विमर्शन, ४. बीजावस्थापन एवं ५.
विलापन भी उसके कार्य हैं—
(क) 'तथापि तद्वत् पञ्चकृत्यानि करोति' (प्र०हृ० १०) ।
(ख) 'आभासनरक्तिविमर्शनबीजावस्थापनविलापनतस्तानि ।।'
प्रमाताओं की दृष्टि से सर्वोच्च प्रमाता 'शिव' है—(प्र०हृ० ११) और उसके
स्फारस्वरूप ७ प्रमाता हैं—
१. सत्य प्रमाता 'शिव' 'परप्रमाता' २. सदाशिवतत्त्वाश्रित प्रमाता = 'मन्त्र-
महेश्वर' ३. ईश्वरतत्त्वावस्थित प्रमाता 'मन्त्रेश्वर' ४. शुद्धविद्यातत्त्वावस्थित प्रमाता 'मन्त्र'
५. शुद्धविद्या तत्त्व से नीचे एवं मायोपरि स्थित प्रमाता = 'विज्ञानाकल' ६. माया-
तत्त्वावस्थित प्रमाता—प्रलयाकल, प्रलय केवली ७. माया प्रमाता, परिमित प्रमाता,
संकुचित प्रमाता—'सकल' (जीव) ॥
शिव का अपर पर्याय है 'प्रकाश' एवं शक्ति का 'विमर्श', 'विमर्श' शिव का
अहमाकार विमर्शन है और जगत् उसी का विराट् 'अवभासन' है ।
शिव की शक्तियाँ—शिव में अनन्त शक्तियाँ हैं किन्तु उन्हें पाँच वर्गों में वर्गीकृत
किया गया है जो निम्न हैं—१. 'चितिशक्ति' २. 'आनन्दशक्ति' ३. 'इच्छाशक्ति' ४.
'ज्ञानशक्ति' एवं ५. 'क्रियाशक्ति' । 'शक्ति' अपने भीतर समस्त चराचर का बीज स्थित