स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८ स्पन्दकारिका
'चिदानन्दलाभ' एवं 'समापत्ति' : 'स्पन्दकारिका' में 'आत्मग्रह' 'आत्मोदय'
'परामृतस्य' एवं 'समापत्ति' प्राप्त करने का प्रतिपादन किया गया है।
'स्पन्दशास्त्र' प्रतिपादित चरमोपलब्धि 'जीवन्मुक्ति'—
यह 'समापत्ति' क्या है? आचार्य क्षेमराज 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' में कहते हैं—
'मध्यविकासाच्चिदानन्दलाभः स एव च परमयोगिनः समावेश समापत्त्यादि पर्यायः
समाधिः तस्य नित्यो-दितत्वे युक्तिमाह—समाधिसंस्कारवति व्युत्थाने भूयो भूयश्चिदैक्या-
मर्शात्रित्योदित समाधि लाभः (प्रत्यभिज्ञाहृदयम्) ॥
इसी चिदानन्द की प्राप्ति के पश्चात् देहादिक की अनुभूति होने पर भी चित्
शक्ति के साथ एकात्मता-प्रतिपत्ति की दृढ़ता से 'जीवन्मुक्ति' की प्राप्ति होती है—
चिदानन्दलाभे देहादिषु चेत्यमानेष्वपि चिदैकात्म्यप्रतिपत्तिदार्ढ्या जीवन्मुक्तिः ॥
(प्रत्यभिज्ञाहृदयम्ः 'शक्तिसूत्र' : १६)
'स्पन्दप्रदीपिका' में भी इसी जीवन्मुक्ति को चरम उपलब्धि स्वीकार करते हुए
कहा गया है—
'इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत् ।
स पश्यन् सततं युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ॥'
जब ऐश्वर्यशक्ति 'मध्यधाम (सुषुम्नापथ) के उल्लास रूप उदान शक्ति एवं विश्व-
व्याप्तिसारभूत व्यानशक्ति को जिसे क्रमशः आनन्दघनरूप 'तुर्यदशा' एवं चिद्घनरूप
तुर्यातीतदशा कहा जाता है—उन्मीलित करती है तब देहादि अवस्था में भी पति-
दशात्मक 'जीवन्मुक्ति' उपलब्ध होती है।
'तुर्यदशारूपां तुर्यातीतदशारूपां च चिदानन्दघनाम् उन्मीलयति तदा देहाद्यवस्थाया-
मपि पतिदशात्मा जीवन्मुक्तिर्भवति ।।' (प्र०हृ०)।
त्रिकदर्शन 'सालोक्य' 'सामीप्य' 'सायुज्य' आदि मुक्तियों को स्थान न देकर
'जीवन्मुक्ति' को महनीय स्थान देते हुए उसे ही यथार्थ मुक्ति मानता है—
१. पशुमात्रस्य सालोक्यं सामीप्यं दीक्षितस्य तु ।
तत्परस्य तु सायुज्यमित्याज्ञा पारमेश्वरी ॥
२. यस्तूर्ध्वशास्त्रगस्तत्र व्यक्तास्थः संशयेन सः ।
व्रजेदायतनं नैव स फलं किंचिदश्नुते ॥
दीक्षायतन विज्ञानद्वेषिणो ये तु चेतसा ।
आचरन्ति च तत्ते वै सर्वे निरयगामिनः ॥ (नरकगामी होते हैं)
ये च स्वभ्यस्तविज्ञानमयाः शिवमया हि ते ।
जीवन्मुक्तो न तेषां स्यान्मृतौ कापि विचारणा ॥
('जन्ममरणविचार' में उद्धृत)
माया एवं शक्ति में अभिन्नता—'माया' शिव की शक्ति है न कि अनिर्वचनीय
भ्रान्ति तत्त्व है—आचार्य शंकर ने 'माया' को मिथ्या भी कहा है किन्तु इसे सत्-असत्-