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सर्वकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 46, कुल 519 में से

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पृष्ठ 46

परिचय एवं पृष्ठभूमि ४५
१. नादसृष्टिवाद—१. चिणि, २. चिणिचिणी, ३. घण्टानाद, ४. शंखनाद, ५.
तन्त्रीनाद, ६. भेरीनाद, ७. तालनाद, ८. वेणुनाद, ९. मृदंगनाद ('कामकलाविलास')
'स्वच्छन्दतन्त्र' के अनुसार—१. घोष, २. राव, ३. स्वन, ४. शब्द, ५. स्फोट, ६.
ध्वनि, ७. झांकार, ८. ध्वंकृति = ८ नाद।
पद्मपादाचार्य के अनुसार वाणी के ५ और ७ पद हैं—
सप्तपदीवाणी—१. शून्य, २. संवित्, ३. सूक्ष्मा, ४. परा, ५. पश्यन्ती, ६.
मध्यमा, ७. बैखरी (स्पन्दकारिका दे० 'स्वरूपावरणे... प्रत्ययोद्भवः')
पञ्चपदीवाणी—१. सूक्ष्मा, २. परा, ३. पश्यन्ती, ४. मध्यमा, ५. बैखरी ।
'शून्य' = स्पन्दहीन, अनुत्पन्न वाक् । 'संवित्' = उत्पन्न होने की इच्छा वाली वाक् ।
'सूक्ष्मा'—उत्पत्यवस्था । 'परा' = मूलाधार में प्रथमोदित ।। (प्र०सा०टीका)
२. सर्वशिववाद—आचार्य सोमानन्दपाद कहते हैं कि 'विश्व' शिव का ही एक
रूप है—
'तस्मादनेकभावाभिः शक्तिभिस्तदभेदतः ।
एक एव स्थितः शक्तः शिव एव तथा तथा ।।' (शिवदृष्टि)
ठीक भी है क्योंकि—'न सावस्था न यः शिवः ।।' (स्पन्दसूत्र) तथा—
'यत्तसत्तपरमार्थो हि परमार्थस्ततः शिवः ।
सर्वभावेषु चिद्व्यक्तेः स्थितैव परमार्थता ।।' (शिवदृष्टि)
'तद्वत्सर्वपदार्थानां जगत्त्यैक्ये स्थितः शिवः ।
तस्मात्सर्वं शिवात्मकम्' (शिवदृष्टि) ।।
'विश्व' परमात्मा के चिदाकाश रूप स्वांग में एक आलेख्य है—
'चिदाकाशमये स्वांगे विश्वालेख्यविधायिने' (शिवदृष्टिवृत्ति)
'स्तवचिन्तामणि' (श्लोक ५) में भी जगत् को पारमेश्वर चित्र कहा गया है—
'निरुपादानसंभारमभित्तावेन तन्वते ।
जगच्चित्रं नमस्तस्मै कलाश्लाध्याय शूलिने ।।' अर्थात्—
शिव महान् कलाकार है और उसकी तूलिका का ही चमत्कार है यह 'जगत' ।।
३. अद्वैतवादी काश्मीरीय शैवदर्शन का उद्देश्य—विश्वशिवैक्यवाद की
अनुभूति है—
(i) The title of the work (शिवदृष्टि = शैवदर्शन) is significant
enough to express clearly what he wants to bring home to his
readers. i.e.—realisation of the whole universe as the manifestation
of one absolute Reality called Siva the all blissful.' (मधुसूदन कौल
शास्त्री) ।