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सर्वकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 38, कुल 519 में से

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पृष्ठ 38

परिचय एवं पृष्ठभूमि ३७
निजाशुद्धासमर्थस्य कर्तव्येष्वभिलाषिणः ।
यदा क्षोभः प्रलीयेत् तदा स्यात्परमं पदम् ॥ (९) ॥
जिस अशुद्धि के कारण क्षोभ उत्पन्न होता है वह भी 'स्व' के द्वारा 'स्व' पर
आरोपित है अतः पारमार्थिक या नित्य नहीं है प्रत्युत् स्वकल्पना (स्वलीला, स्वक्रीडा
कल्पित है) अतः उसका दूरीकरण भी 'स्व' के द्वारा (उन्मेष के माध्यम से) सहज
संभाव्य है । इस विषय में भी कारिकाकार ने 'निज' शब्द का प्रयोग करके अशुद्धि
(मल, अज्ञान एवं बंधन) की दुर्निवार्य भयंकरता परवशता, अशक्य संसारोत्तीर्णता पर
विराम चिह्न लगाते हुए संकेतित किया है कि इसकी भयानकता कोई परकृत नहीं प्रत्युत्
आत्मकृत मात्र है अतः न तो दुर्निवार्य है और न तो यथार्थतः भयानक ही है । सब कुछ
'स्व' की ('निज' की) आरोहण लीला का चमत्कार है । आत्मबल का स्पर्श होते ही
यह 'स्व' (निज) (स्पन्द) (या आत्मा) में विलीन हो जाता है । सब कुछ 'स्व' की
स्वकल्पित लीला है । 'स्व' का (निज का) या अपना अकृत्रिम धर्म तो—सर्वज्ञातृत्व,
सर्वकर्तृत्व, सर्वतृप्ति, सर्वव्याप्ति आदि माहेश्वर धर्म हैं क्योंकि 'स्व' स्वयं महेश्वर है—
'तदाऽस्याऽकृत्रिमो धर्मो ज्ञत्वकर्तृत्वलक्षणः ।
यतस्तदीप्सितं सर्वं जानाति च करोति च ॥ १० ॥
सारा प्रापंचिक व्यापार दो अवस्थाओं के मध्य है—१. कार्य २. कारण १.
भोग्य २. भोक्ता १. दृश्य २. द्रष्टा १. वेद्य २. वेदक या १. स्मर्त्तव्य २. स्मर्ता और ये
सभी 'स्व' (आत्मा) के ही विभिन्न रूप हैं क्योंकि ये 'स्पन्द' (स्व, आत्मा, संवित्) की
ही द्विविध अवस्थायें हैं—
अवस्था युगलं चाऽत्र कार्यकर्तृत्वशब्दितम् ।
कार्यता क्षयिणी तत्र कर्तृत्वं पुनरक्षयम् ॥ १४ ॥
जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय, तुरीयातीत, शुभेच्छा, तनुमानसा, सत्त्वापत्ति,
तुर्यगा आदि ज्ञान की सप्तावस्थायें तथा अन्य अनेकविध मानसिक-शारीरिक सभी
अवस्थाओं के वैविध्य एवं भेदात्मकता में 'स्व' (स्पन्द, आत्मा, प्रत्यक् चैतन्य) सदैव
'एक' 'अभेद' अद्वैत रूप में स्वक्रीडा करता रहता है । सारी अवस्थायें भी उसीका रूप
है किन्तु वह स्वयं अवस्थातीत है । उसकी 'उपलब्धि, (व्यापकता) सर्वत्र है,
त्रिकालाबाधित है—
'तस्योपलब्धिः सततं त्रिपदाव्यभिचारिणी' । (१७)
'स्पन्द' या परमाशक्ति विश्वस्वरूपा है अतः विश्व भी 'स्व' का ही विस्तार है—
'यदा सा परमा शक्तिः स्वेच्छया विश्वरूपिणी'
उसकी 'स्फुरत्ता' ही विश्व एवं चक्र की उद्भाविका है—'स्फुरत्तात्मनः पश्येत्तदा
चक्रस्य संभवः ।।' 'चितिः स्वतन्त्रा विश्वसिद्धिहेतुः ।।' 'विमर्श' के ही 'दर्पण' में स्वयं
'महाबिन्दु' भी प्रतिबिम्बित होता है—
परशिवरविकरनिकरे प्रतिफलति विमर्शदर्पणे विशदे ।
प्रतिरुचिरुचिरे कुड्ये चित्तमये निविशते महाबिन्दुः ।। (कामकलाविलास)