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सर्वकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 36, कुल 519 में से

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पृष्ठ 36

परिचय एवं पृष्ठभूमि ३५
‘चैतन्यमात्मनो रूपं सिद्धं ज्ञानक्रियात्मकम् ।
तस्यानावृतरूपत्वाच्छिवत्वं केन वार्यते ॥’
‘नेत्रतन्त्र’ में भी यही प्रतिपादित किया गया है—
‘परमात्मस्वरूपन्तु सर्वोपाधिविवर्जितम् ।
चैतन्यमात्मनो रूपं सर्वशास्त्रेषु पठ्यते ॥’
चिदानन्द की प्राप्ति से जडात्मक देहादिकों में चिदैक्य प्रतिपत्ति की दृढ़ भावना
होने पर ‘जीवन्मुक्तावस्था’ प्राप्त होती है—
‘चिदानन्दलाभे देहादिषु चेत्यमानेष्वपि चिदैक्यप्रतिपत्तिदार्ढ्यं जीवन्मुक्तिः ॥’
(प्रत्यभिज्ञाहृदयम्)
सिद्धान्तानुसार चिच्छक्ति से कुछ भी भिन्न हो ही नहीं सकता क्योंकि सृष्टि
केवल चिच्छक्ति का स्फार या बाह्य प्रकाशन मात्र है । चैतन्य ही आत्मा का लक्षण
है स्पन्दशास्त्र में कहा गया है कि विश्वबीज चैतन्य आत्मतत्त्व में अहंता स्थापित होने पर
पर्वतादि का भी इच्छा मात्र से संचालन किया जा सकता है । ‘विरूपाक्षपञ्चाशिका’ के
विश्वात्मा स्कंध में ‘चैतन्यमात्मा’ (शिवसूत्र) के सार का प्रतिपादन किया गया है ।
ज्ञानक्रियात्मक परिपूर्णस्वतन्त्र चैतन्य ही आत्मतत्त्व है । सर्वज्ञत्व-सर्वकर्तृत्वसम्पन्न,
पूर्णस्वतन्त्र, चेतन पदारूढ आत्मतत्त्व ही शिव भी है ।
चूँकि स्रष्टा परमशिव अपनी लीला हेतु अपनी सर्वज्ञता, सर्वकर्तृता आदि शक्ति
को संकुचित करके जीव के रूप में क्रीडा करते हैं अतः चैतन्यविग्रह आत्मतत्त्व या
चिद्रूप शिव से भिन्न कुछ भी नहीं है ।
विश्वात्मवाद—‘स्पन्द’ एवं ‘प्रत्यभिज्ञा’ दर्शन संपूर्ण विश्व को अहंभाव से देखने
की ही वास्तविक ज्ञान एवं अपने विराट् स्वस्वरूप की ‘प्रत्यभिज्ञा’ मानते हैं । इसके
किसी एक अंश में अहन्ता तो जीवन्मृतावस्था है—
उत्क्रम्य विश्वतोऽङ्गात् तद्भागैकतनुनिष्ठताहन्तः ।
कण्ठलुठत्राण इव व्यक्तं जीवन्मृतो लोकः ॥
‘पूर्णांहन्ता’ एवं ‘विश्वाहन्ता’ ही पूर्णत्व है । यही शिवत्वाप्ति है । इदन्ता एवं
अहन्ता के ऐक्य से समुत्पन्न पूर्णांहन्तारूपी संवित् का साक्षात्कार ही प्रत्यभिज्ञान है और
यही सारतम उपलब्धि या मोक्ष है ।
जगत् का स्वस्वरूप जान लेने पर उसमें चिन्मयत्व का ही संदर्शन होता है—
(१) यदैव विदितं विश्वं तदानीमेव चिन्मयम् ।
(२) वेद्यो वेदकतामाप्तो वेदकः संविदात्मताम् ।
संवित् त्वदात्मा चेत् सत्यं तदिदं त्वन्मयं जगत् ॥
सर्वात्मवाद—समस्त विश्व-प्रसार और उसके समस्त पदार्थ केवल आत्मा के
स्फार हैं । ‘विरूपाक्षपञ्चाशिका’ में भगवान् शिव ने इन्द्र को—‘विश्वात्मा’ ।