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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 203, कुल 519 में से

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पृष्ठ 203

१०२ स्पन्दकारिका
हैं—(‘बृहस्पति’ सूत्र के अनुसार)—
१) तत्त्व = ‘पृथिव्यापस्तेजोवायुरिति तत्त्वानि’ ।
२) शरीर, इन्द्रिय, विषय = ‘तत्समुदाये शरीरेन्द्रियविषयसंज्ञा ।’
३) चैतन्य = ‘तेभ्यश्चैतन्यम् ।’
४) चैतन्योत्पत्ति = किण्वादिभ्यो मदशक्तिवत् विज्ञानम् । पाँच भूत—(अन्न के
संघटन से मादक शक्ति शराब आदि उत्पन्न हो जाती है उसी प्रकार भूतों के संघटन से)
‘विज्ञान’ (चैतन्य) उत्पन्न हो जाता है ।
५) भूत ही चैतन्योत्पत्ति के कारण—‘भूतान्येव चेतयन्ते’
६) आत्मा—चैतन्यविशिष्टः कायः पुरुषः ।
७) जीव = जलबुद्बुदवज्जीवाः ।
८) परलोकाभाव—परलोकिकोऽभावात् परलोकाभावः ।
९) मोक्ष—‘मरणोऽपवर्गः’ ।
१०) स्वर्गसुख = धूर्त-प्रलाप । धूर्त प्रलापस्त्रयी स्वर्गोत्पादकत्वेन विशेषाभावात्।
११) पुरुषार्थ—अर्थ कामौ पुरुषार्थों ।
१२) विद्या = दण्डनीतिरेवविद्या ।
१३) प्रमाण—प्रत्यक्षमेव प्रमाणम् ॥
१४) अनुसर्तव्य मार्ग = ‘लौकिको मार्गोऽनुसर्तव्यः ॥’
विज्ञानवादी बौद्ध मानते हैं कि ‘चित्त’ ही एकमात्र तत्त्व है अन्य नहीं—(यही चित्त
‘विज्ञान’ भी कहा जाता है) ॥
‘चित्तं वर्ततेचित्तमेव विमुच्यते ।
चित्तं हि जायते नान्यच्चित्तमेवनिरुध्यते ।
चित्त ही मात्र एक परम सत्य है । चित्त ही जन्म लेता है, मुक्त होता है, और वही
निरुद्ध होता है ।
‘विज्ञान’ के निम्न पर्याय हैं—‘लंकावतार सूत्र’ ।
१. ‘चित्त’ २. ‘मन’ ३. ‘विज्ञप्ति’
‘विज्ञान’ एवं आलय विज्ञान—
‘चित्तं मनश्च विज्ञानं संज्ञा वैकल्पवर्जिताः ।
विकल्पधर्मतां प्राप्ताः श्रावका न जिनात्मजाः ॥’
(‘लंकावतार’ ३।४०)
चेतन क्रिया से सम्बद्धता, अतः—‘चित्त’ मनन क्रिय से सम्बद्धता, अतः—
‘मन’ एवं विषय—विग्रह की कारणता अतः यही—‘विज्ञप्ति’ कहलाता है—