स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिचय एवं पृष्ठभूमि १७
'प्रत्यभिज्ञा-शास्त्र' के रूप में प्रतिष्ठित करने का कार्य उनके शिष्य उत्पलदेवाचार्य ने—
'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' नामक ग्रन्थ ('शिवदृष्टि' की व्याख्या के रूप में रचित) द्वारा सम्पादित
किया किन्तु 'शिवसूत्र' के साधनात्मक, श्रद्धात्मक एवं धार्मिक पक्ष को प्रस्तुत करने के
लिए जिस ग्रन्थ का प्रणयन किया गया—उसका नाम है 'स्पन्दकारिका'।
प्रश्न उठता है कि शिवसूत्रों की व्याख्या करने वाली इस शाखा ने शिवसूत्रों को
'स्पन्दसूत्र' या स्पन्दकारिका' के नाम से क्यों ग्रहण किया ? शिवसूत्रों में तो कहीं भी
'स्पन्द' शब्द का भूल से भी प्रयोग नहीं किया गया है? इसका समाधान यह है कि शिव
के 'प्रकाश' पक्ष को जिन आचार्यों ने प्राधान्य दिया वे सोमानन्द, एवं उत्पलदेव आदि
आचार्य शैवशास्त्र को खण्डनमण्डनात्मक पद्धति से तार्किक एवं दार्शनिक आधार देते
हुए मुख्यतः सैद्धान्तिक पक्ष पर जोर देते रहे और उन्होंने अपनी चरम उपलब्धि
'प्रत्यभिज्ञा' के रूप में स्थापित की । चूँकि इस दर्शन या साधना-पक्ष विवृत नहीं हो पा
रहा था । अतः एतदर्थ स्पन्दसूत्र (स्पन्दकारिका) की रचना की गई ।
एक प्रश्न पुनः उठता है कि यदि 'शिवसूत्र' सिद्धान्त-प्रधान मात्र था तो उसकी
साधना-प्रधान व्याख्या 'स्पन्दसूत्र' में करके क्यों शिवसूत्रों की मूल दृष्टि के साथ
विश्वासघात नहीं किया गया? इसका उत्तर यह है कि स्वयं 'शिवसूत्र' भी साधना-प्रधान
हैं क्योंकि उनका अध्यायीकरण साधना के तीन उपायों—(१) 'शांभवोपाय' (२)
'शाक्तोपाय' एवं (३) 'आणवोपाय' के नाम पर ही किया गया है और 'स्पन्दसूत्र' भी
मात्र साधनाशास्त्र ही नहीं है प्रत्युत् सिद्धान्तपक्ष का प्रस्तोता भी है । सोमानन्दपाद की
'शिवदृष्टि' एवं 'स्पन्दसूत्र' दोनों शिवसूत्रों की व्याख्यायें हैं किन्तु दोनों में दृष्टिभेद है ।
'स्पन्दकारिका' को वसुगुप्त की रचना माना जाता है और 'शिवसूत्र' को वसुगुप्त के द्वारा
उद्धार की गई रचना स्वीकार किया जाता है । यदि 'स्पन्दकारिका' के रचनाकार वसुगुप्त
स्वयं ही शिवसूत्रों की व्याख्या 'स्पन्दसूत्र' के रूप में करते हैं तो स्पष्ट है कि 'शिवसूत्र'
एवं 'स्पन्दसूत्र' दोनों में ऐकात्म्य है और यदि दृष्टि-वैषम्य के बिन्दु सिद्ध भी हो जायें तो
मानना पड़ेगा कि ये बिन्दु भी प्रारंभ से ही रहे हैं ।
प्रश्न पुनः अनुत्तरति रह जाता है कि काश्मीरी अद्वैतवाद की इस शाखा का नाम
'स्पन्द' क्यों रखा गया ? वसुगुप्त ने 'स्पन्दकारिका' एवं सोमानन्द (९०० ई०) ने
'शिवदृष्टि' द्वारा कश्मीरी अद्वैतवादी शैवमत की पृष्ठभूमि प्रस्तुत की काश्मीरी शैवमत
की अद्वैतवादी शाखा के ये ही मूल संस्थापक हैं । 'सोमानन्द' वसुगुप्त के शिष्य हैं ।
उनके समय में स्पन्दकारिका ('स्पन्दशास्त्र' के नाम से) विद्यमान थी । उन्होंने 'शिवदृष्टि'
के प्रारंभ में (प्रथम श्लोक की व्याख्या में) 'नहीच्छानोदनस्यायं प्रेरकत्वेन वर्तते' (१।८)
सूत्र को उद्धृत भी किया है । उनके शिष्य ने 'शिवदृष्टि' की व्याख्या के रूप में जिस
'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' का प्रणयन करके 'प्रत्यभिज्ञा शाखा' के नाम से शैवाद्वैतवादी एक नए
मत का नामकरण किया यह नाम ही 'शिवदृष्टि' के प्रथम श्लोक की व्याख्या में
सोमानन्द ने 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा प्रपंचित न्यायेन' वाक्य द्वारा पहले से ही लिख दिया था ।
१. सोमानन्द का 'शिव' 'अस्मद्रूपसमाविष्ट' शिव है ।
स्पं. भू. १