सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची
इस चित्र में कोई लिखित पाठ (श्लोक, सूत्र, अन्वय अथवा हिन्दी टीका) उपलब्ध नहीं है।
यह चित्र श्री ललिता महात्रिपुरसुन्दरी (श्री राजराजेश्वरी) का है, जिनके साथ भगवती लक्ष्मी (कमलधारिणी) तथा भगवती सरस्वती (वीणावादिनी) विराजमान हैं, एवं मध्य में श्रीचक्र (श्रीयन्त्र) प्रतिष्ठित है।
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श्रीमत् परमहंस परिव्राजकाचार्य श्री १००८ शंकरभगवत्पाद विरचिता
सौन्दर्य लहरी
हिन्दी अनुवाद और
श्री विद्यातत्त्व कुण्डलिनी रहस्य
सहित
लेखक:—
स्वामी विष्णुतीर्थ महाराज
शुल्क ] १९४९
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(इस पृष्ठ/चित्र में कोई लिखित पाठ (Text/श्लोक/सूत्र) उपलब्ध नहीं है। यह केवल श्रीयन्त्र का एक रेखाचित्र/प्रतिमा है।)
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श्रीमत् परमहंस परिव्राजकाचार्य श्री १००८ शंकरभगवत्पाद
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श्रीमच्छंकर भगवत्पादकी जीवन झांकी
और
सौन्दर्य लहरी ।
अद्वैत स्थापनाचार्यं शंकरं लोक सद्गुरुम्
प्रस्थान त्रय भाष्यादि ग्रंथकारं नमाम्यहम्
अहं ब्रह्मस्वरुपिणो, मत्तः प्रकृतिपुरुषात्मकं जगत् शून्यं चाशून्यच ।
श्रीमद्भगवत्पाद जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने सौन्दर्यलहरी स्तोत्र में श्री आदि शक्ति मूलमाया एवं शुद्ध विद्या का तात्विक, यौगिक, और प्राकृतिक सगुणरुप का, रसगर्भित, भक्तिपूर्ण, व मनोहर वर्णन किया है । भगवत्पाद ने जो अनेक ग्रंथ तात्विक और धार्मिक विषय के लिखे हैं, उनमें 'सौन्दर्यलहरी' एक संकीर्ण स्तोत्र है, जिस की रचना भगवत्पादने बाल्यावस्था में ही की थी, ऐसा श्लोक ७५ और १०० से प्रकट होता है । श्रीशंकराचार्य का जन्मकाल इतिहास संशोधन कर्ता डा. भाण्डारकर, जस्टिस तैलंग, लो. तिलक, हाईकोर्ट वकील नारायण शास्त्री (age of shankar के लेखक), लो. का. बा. पाठक व म. रा. बोडस M. A. L L B प्रभृति विद्वद्मण्डली ने ७८८ ई. में केरल देशके कालडी ग्राम में वैशाक शु. १० मी को निश्चित किया है। इन की माता का नाम आर्य्यअंबा, पिता का नाम शिवगुरु और आजा का नाम
२
विद्याधिराज था। शिवगुरुजी को संतान न होने के कारण उन्होंने शिवजी की आराधना की, जिस के फल स्वरूप भगवत्पाद का जन्म हुआ। बाल शकर का उपनयन संस्कार ५ वें वर्ष में हुआ और असाधारण विशद बुद्धि होने से ८ वर्ष की अवस्था में ही उन्होंने वेदाध्ययन एवं १२ वें वर्ष में सब शास्त्राभ्यास समाप्त कर लिया, और उसी समय उनके पिता के भौतिक देह का परित्याग करदेने पर तत्पश्चात् ही ब्रह्मचर्य अवस्था में ही तीव्र वैराग्य उदय होने पर श्री श्रीगोविन्द पादाचार्य से ॐ कारेश्वर क्षेत्र में नर्मदा तटपर संन्यास दीक्षा ली। और १६ वर्ष की अवस्था में काशी जाकर प्रस्थान त्रयी पर भाष्य लिखे। तदन्तर सनातन वैदिक धर्म के पुनर्संस्थापन का अलौकिक कार्य किया; और तत्कालीन प्रचलित अवैदिक धर्म संप्रदायों को निरस्त किया। अद्वैत वेदान्त के सिद्धांत की विश्व में सुदृढ नींव कायम करने का एकांत श्रेय श्रीमच्छंकर भगवत्पाद को ही है। इतना सब कुछ आलौकिक कार्य ३२ वर्ष के अल्प समय में संपादित करके सन ८२० ई. में अपना प्रातः स्मरणीय नाम सदा के लिये छोडगये।
भगवत्पाद के घराने में परंपरागत सांबशिव उपासना चली आती थी। उनके शृंगेरी आदि मठों में शिव व शारदादि की शक्ति उपासना अद्यापि प्रचलित है शिव से निर्गुण परमतत्व प्राप्ति का ज्ञान मार्ग और शक्ति से शुद्धविद्या की उपासना समझना चाहिये। कांची मठ में श्रीचक्र की तांत्रिक उपासना समयाचार पद्धति के अनुसार आज भी होती है, जहां भगवत्पाद का विद्यार्थी कालीन आचार्य कुल था। सौन्दर्यलहरी के ११ वें श्लोक में श्रीचक्र का