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सर्वकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 203, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 203

१७४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

लोभरूपी साँप और बिच्छू रहते हैं। विषयोंके अनेक मार्गोंसे वह प्रदेश व्याप्त है। काम और क्रोधरूपी बधिक तथा लुटेरे उसमें सदा डेरा डाले रहते हैं। उस महादुःखमय विशाल वनको लाँघकर अब मैं एक ऐसे महान् विपिनमें प्रवेश कर चुका हूँ, जहाँ पहुँचकर उसके तत्त्वको जाननेवाले ज्ञानी पुरुष न शोक करते हैं, न हर्ष। वहाँ किसीसे भय नहीं है, किसीको भी भय नहीं है। उस विद्यारूपी वनमें सात बड़े भारी वृक्ष हैं। वहाँ सात ही पर्वत हैं, जिन्होंने तीनों लोकोंको धारण कर रखा है। सात ही हृद (कुण्ड) हैं और सात ही नदियाँ हैं, जो सदा ब्रह्मरूप जल बहाया करती हैं। तेज, अभयदान, अद्रोह, कौशल (दक्षता), अचपलता, अक्रोध और प्रिय वचन बोलना—ये ही सात पर्वत उस विद्यावनमें स्थित हैं। दृढ-निश्चय, सबके साथ समता, मन और इन्द्रियोंका संयम, गुणसंचय, ममताका अभाव, तपस्या तथा सन्तोष—ये सात हृद हैं। भगवान्‌के गुणोंका विशेष ज्ञान होनेसे जो उनके प्रति भक्ति होती है, वह विद्या-वनकी पहली नदी है। वैराग्य दूसरी, ममताका त्याग तीसरी, भगवदाराधन चौथी, भगवदर्पण पाँचवीं, ब्रह्मैकत्वबोध छठी तथा सिद्धि सातवीं नदी है। ये ही सात नदियाँ वहाँ स्थित बतायी गयी हैं। वैकुण्ठ धामके निकट इन सातों नदियोंका संगम होता है। जो आत्मतृप्त, शान्त तथा जितेन्द्रिय होते हैं, वे ही महात्मा उस मार्गसे परात्पर ब्रह्मको प्राप्त होते हैं। कोई श्रेष्ठ ज्ञानीजन उन वृक्षोंको प्राप्त करते हैं, कोई पर्वतोंको, कोई हृदोंको तथा कोई उन सात सरिताओंको ही प्राप्त होते हैं।

माँ! मैं ग्रहण किये हुए व्रतको धारण करनेकी इच्छा रखकर यहाँ ब्रह्मचर्यका आचरण करता हूँ। इस ब्रह्मचर्यमें ब्रह्म ही समिधा, ब्रह्म ही अग्नि तथा ब्रह्म ही कुशास्तरण हैं। जल भी ब्रह्म हैं और गुरु भी ब्रह्म ही हैं—यही मेरा ब्रह्मचर्य है। विद्वान् पुरुष इसीको सूक्ष्म ब्रह्मचर्य मानते हैं। माता! अब मेरे गुरुका परिचय सुनो, जिन्होंने मुझे विद्या प्रदान की है। एक ही शिक्षक है, दूसरा कोई शिक्षक नहीं है। हृदयमें विराजमान अन्तर्यामी पुरुष ही शिक्षक होकर शिक्षा देता है। उसीसे प्रेरित होकर मैं झरनेसे बहकर जानेवाले जलकी भाँति जहाँ जिस कार्यमें नियुक्त होता हूँ, वहाँ वैसा ही करता हूँ। एक ही गुरु हैं, उनके सिवा दूसरा कोई गुरु नहीं है। जो हृदयमें विराजमान हैं, वे ही गुरु हैं, उनको मैं प्रणाम करता हूँ। उन्हीं गुरुस्वरूप भगवान् मुकुन्दकी अवहेलना करके सम्पूर्ण दानव पराभवको प्राप्त हुए हैं।* एक ही बन्धु है, उसके सिवा दूसरा बन्धु नहीं है। जो हृदयमें विराजमान है, वह परमात्मा ही बन्धु है, मैं उसे नमस्कार करता हूँ। उसीसे शिक्षा प्राप्त करके सात बन्धुमान् भाई सप्तर्षि आकाशमें प्रकाशित हो रहे हैं। ऐसे ही ब्रह्मचर्यका भलीभाँति सेवन करना चाहिये। अब मेरा गार्हस्थ्य कैसा है, यह भी सुन लो। माताजी! प्रकृति ही मेरी पत्नी है, किन्तु मैं कभी उसका चिन्तन नहीं करता; वही सदा मेरा चिन्तन किया करती है। वह मेरे सब प्रयोजनोंको सिद्ध करनेवाली है। नासिका, जिह्वा, नेत्र, त्वचा, कान, मन तथा बुद्धि—यह सात प्रकारकी अग्नि सदा मेरी अग्निशालामें प्रज्वलित होती रहती हैं। गन्ध, रस, रूप, शब्द, स्पर्श, मन्तव्य और बोधव्य—ये ही सात मेरी समिधाएँ हैं। होता भी नारायण हैं और ध्यानसे साक्षात् नारायण ही उपस्थित हो उस हविष्यका उपयोग भी करते हैं। ऐसे यज्ञद्वारा मैं अपनी इस गृहस्थीमें उन परमेश्वर विष्णुका यजन (आराधन) करता हूँ। किसी भी वस्तुकी कामना नहीं रखता, तथापि मेरे सम्पूर्ण काम स्वतः सिद्ध हैं। मैं


* एको गुरुर्नास्ति ततो द्वितीयो यो हृद्गतस्तमहं वै नमामि।
पञ्चावमन्यैव गुरुं मुकुन्दं पराभूता दानवास्सर्व एव॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३७। ६२)

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