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सर्वकोश
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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अट्ठाईसवीं पुतली २९. ( १७७ )
और वहां जाकर देखा, तो इसका ऐसा हाल हो रहा है सो
देखकर वह रत्न यानी लाल उस स्त्रीको दिया और कहा कि
जो तू इससे मांगेगी सो यह लाल तेरी आशा तुरंत ही पूरी
करेगा. उसको ले वह नारी अपने धामको गई और राजा
वीरविक्रमादित्यभी अपने महलमें आ दाखिल हुवा इतनी
बात कह पुतली बोली कि, सुन राजा भोज ! ये गुण विक्रममें
थे. वह ऐसा साहसी था और प्रजाका हितकारी. जो तू सात
स्वर्ग फिर आवेगा तो भी उसके समान कोई न हो सकेगा.
इससे अब तू अपने मनके ख्यालसें बाज आ. और जो राजाने
काम किये हैं सोही तुझसे कहूंगी. वहभी दिन उसी तरहसे
टल गया. रात ज्यों त्यों बीत गई. दूसरे दिन सुबह होतेही
राजा भोज अपने दीवानको साथ ले आया. और फिर सिंहा-
सनके पास जाकर खडा हुआ. इतनेमें वैदेही नाम --