सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १७४ ) सिंहासनबत्तीसी.
आनेका समाचार कहो कि, मर्त्यलोकसे राजा विक्रम आपके
दर्शनके लिये आया है. सुनतेही डेवढीदारोंने अपने राजाके पास जा
विक्रमकी खबर दी. सुनकर राजा बालिने कहा नरको मैं अपना
मुँह न दिखाऊंगा. यह सुनकर दरवानने आ राजासे कहा कि,
तुम्हें दर्शन न पाऊंगा तब तलक यहांसे मैं न हलूंगा. यह बात
दरवानने जाकर राजा बालिसे कही. तब उसने कहा कि,
विक्रम तो कौन है ! जो राजा इंद्रभी आवे तो मै अपना दर्शन
दूंगा नहीं. फिर कोई मनमें बिचार न आया फिर एक दिन
राजाने दुःख पाके अपना शिर काट डाला ओर बलिकी तमाम
सभामें रोला मचा कि, बडा अयुक्त काम इस प्राणीने
किया. राजाने यह बात सुन हंसकर आज्ञा दी कि, अमृत लेजाकर
उसे जिलाओ और कहा कि, तुझे राजाका दर्शन होगा तू
अपने जीमें मत घबरा इस वख्त तूं जा और अपना
राजकाज कर जब शिवरात्रि आवेगी तब आइयो तुझे दर्शन
मिलेगा, यह सुन एक दास राजाका अमृत ले गया. और
राजा बीरविक्रमादित्यर छिडककर जियाला, जब राजा
सावधान होकर बैठा तब उसने राजा बालिका संदेश सब
कहा. यह सुनकर विक्रम बोला कि, तुम यह बात कहकर मुझे
क्यों बहँकाते हो ? मैं तुम्हारा कहा नहीं मानूंगा. इससे उत्तम
यह है कि, तुर्त महाराजाका दर्शन करूं. वह सुन लोगोंने राजाके
पास जाकर कहा कि, महाराज ! वह नहीं मानता और