सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १७२ ) सिंहासनबत्तीसी.
पुतलियां खिल २ हँसने लगीं. और सब सभा भौंचक
होगई. और जीमें सब लोग कहने लगे कि, राजाने क्या
यह अपन किया कि, बिना बात सुन सिंहासनपर पांव धर
दिया. यह अपनी दशा देख राजा भोज बहुत पछताकर
लज्जित हुआ. तब पुतली बोली कि, ऐ मुर्ख ! तूने हमारी
बात न सुनकर यह फल पाया. अब तू ऐसा ही
रह. यह सुन राजा निराश होकर बोला-इसका उपाय
बताओ. पुतली बोली-राजा विक्रमका नाम ले तब तू
इस दुःखसे छूटेगा. जब विक्रमका यश राजा भोजने बखान
किया तब हाथ छूट गया और आँखसेभी सूझने लगा. फिर
नीचे उतर खड़ा हुआ. देखकर सब लोग भयमान होंगये
और राजाभी अपने चित्तमें डरा. सभाके सब लोग बोले कि,
राजा विक्रमके समान होना इस कलियुगमे बड़ा कठिन है. फिर
पुतली बोली कि, राजा ! इसीवास्ते मैंने कहा था और तू मेरी
बात झूठ मत मान, तू मूर्ख है. कुछभी तुझे ज्ञान नहीं. जो तू
विद्या पढ़ा है इससे कुछ होता नहीं. ज्ञान हे सो औरही चीज है
अपने बराबर राजा बीरविक्रमादित्यको मत समझ. वह देवता-
ओंके समान था. और उसके बराबर ज्ञान ध्यान तेरा नहीं. अ-
पने जीमें इस सिंहासनकी आश छोड़. वह सिंहासन तुझे नहीं
साजेगा और संसारमें बहुत बातें हैं वे कर, जिसमें तेरा राज