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सर्वकोश
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 168, कुल 190 में से

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पृष्ठ 168

( १६८ ) सिंहासनबत्तीसी.

संकट हुआ है तहां तहां उसका सहाय किया है. यह स्तुति करके
उन तपस्वियोंने कहा कि, महाराज ! एक नृपतिभी हमारे साथ
तपस्या करता था, मालूम नहीं कि, उसको उठानेकी आपकी आज्ञा
हुई कि नहीं यह सुन महादेवने उस गणके तरफ देखा. देख-
तेही उसने अमृत ले जाकर जो धुनी बाकी रहीथी उसपर छिड़-
का राजाभी हरिहर कहता उठ खडा हुआ और हाथ जोड स्तुति
करने लगा कि, महाराज ! संसारके सब जीवोंकी आप सहाय
करते हैं और पालते हैं आप बिना इस संसारसागरसे कौन पार
उतारे ? जिसने जगमें आपको नहीं पहुँचाना उसने अपना जन्म
निष्फल खोया. फिर जितने तपस्वी वहां थे उनको शिवजीने मुंह
मांगा वर दिया. और सबको बिदा किया. सबके पीछे जब राजा
अकेला रहगया तो उसे कहा कि, हे राजा वीरविक्रमादित्य ! अब
जो तेरी इच्छामें आवे सोही वह मुझसे मांग मैं तुझे दूंगा. यह
सुन राजाने कहा-महाराज ! आपकी दयासे सब कुछ है पर एक
यह मांगता हूँ कि-संसारके जन्ममरणसे मेरा निबेडा करो. जैसे
और भक्तोंका निबेडा किया तैसे मुझ परमपापी आधीन दीनही-
नको तारो. यह राजाकी विनती सुन दयाकर शिवजीने हँसकर
कहा कि, तेरे समान कर्मी इस कलियुगमें कोई नहीं है. ओर तू
ज्ञानी, भोगी, दानी, साहसी, तपस्वी है, कलिके राजाओंका उद्धार कर-