सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचौबीसवीं पुतली २४. (१९७)
है जो कभी खबर पायेगा तो राजाके दरबारमें फरियादको
जायगा. तब राजा तुझे और मुझे मार डालेगा. इससे बेहतर
यह है कि, पहिले तू इसे मार फिर आवो निडर हो हम तुम
सुखसे भोग करें. उसने विलंब कुछ न किया सुनतेही घरमें जा
कटारी मारकर फिर राजाके पास चली आई और वह जवा-
हिरांका डब्बा राजाके पास दिया. और दोनों इस तरहसे
नगरके बाहर गये. फिर आगे आगे राजा और पीछे वह स्त्री.
जब नदीके किनारे पहुँचे तब राजां वहांही खड़ा हुआ. और
अपने जीमें बिचार करने लगा कि, जिसने अपने स्वामीको
मारनेमें विलंब न किया उससे दूसरेकी क्या भलाई होगी ?
इस वास्ते अब इससे जुदा होइये और इसका चरित्र क्या
क्या है सो देखिये कि, अब यह क्या करती है ? यह दिलमें
विचार कर राजाने कहा ऐ सुंदरी ! मैं देखूं पहले इस नदीमे
जल कितना है ? जो मै इस नदीकी थाह पाऊं तो इसी
रास्ते तुझको भी ले चलूंगा. यह कह राजा नदीमें पैठा. और
पैरकर पारका रास्ता लिया. जब उस किनारे जा पहुँचा
तब पुकारकर कहा कि मैं तो पार उतर आया. पर तुझे ला
नहीं सक्ता क्योंकि इसमें पानी तो अथाह है. यह कह राजाने
आगेकी राहली तब उस औरतने अपने मनमें बिचारा कि,
द्रव्य तो सब उसके हाथ लगा है इसके लोभसे वह मुझे छोड़