सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १४० ) सिंहासनबत्तीसी.
जीताही जलनेको तैयार हुआ. दीवान और प्रधानने कितना
मना किया पर न माना जो चाहे कि उस चितामे बैठकर
आग लगावे कि बैतालने आ हाथ पकड़ लिया और कहा कि-
हे राजा ! तू अपना जी क्यों देता है ? तब इसने कहा कि-दो
की जान मैंने जानके खोई अब मेरा भी जीना संसारमें उचित
नहीं इस बदनामीके जीनेसे मरनाही उत्तम है, तब बैतालने
कहा कि-राजा मैं अमृत लाकर देताहूं- तू दोनोंको जिलादे
यह कह जल्द बैताल पातालमें जाकर अमृत लेकर आया
और उस ब्राह्मणपर छिड़काया तब वह उठा फिर ले जाकर
कामकंदलापर छिड़का वह जी उठी और माधव माधव पुकारने
लगी. राजाकी सूरत देखकर कहा कि महाराज ! तुम कौन हो
और कहाँसे आये सो मुझसे कहो तब राजाने कहा-हम बीर
विक्रमादित्य हैं और माधवका बिरह दूर करनेके लिये उज्जैन
नगरीसे यहां आये हैं तुम अपने मनमें खातिर जमा रक्खो
कि तुम्हें हम माधवसे मिला देंगे. यह बात राजाके मुखसे सुनते
ही वह उठ राजाके पांवपर गिरपड़ी और बोली कि-महाराज !
यह तुम जीवदान दोगे. और जैसा तुम्हारा यश सुनतीथी वैसा
ही दृष्टिमें आया इतनी बात कह राजा वहांसे फिर अपने
लश्करको आय मिला. दूसरे दिन अपनी फौज ले कामनगरी
पर चढ़ धाये वहांके राजासे युद्ध कर उसको जीता. तब उस