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सर्वकोश
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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पृष्ठ 138

इकीसवीं पुतली २१. (१३७)

बनाव सिंगार करके आओ. रानियां जब सिंगार कर आई तब
उस विप्रसे राजाने कहा इनमेंसे जिसे तुम्हारी इच्छा होगी
उसको लो और अपने मनमें दुःख न कर चैन करो. तब उसने
जवाब दिया कि, महाराज ! मैं आपके आगे सत्य कहताहूं कि
मेरी आंखमें वह बस रही इस लिये और कुछ मेरी दृष्टिपे
नहीं आता. चातककी तृषा स्वातीके बूँदसे बुझती है और
जलपर उसे रुचि नहीं वैसी है प्रेमकी दृढता. यह दृढता विप्रकी
देख राजाने अपने मनमें बिचार किया कि इसे साथ ले जाकर काम-
कंदलाको दिलाऊं. अन्यथा इसके मनको स्थिरता नहीं होगी. यह
बात राजाने बिचार विप्रसे कहा. देवता ! तुम स्नान पूजा कर
कुछ खाओ. तब तलक मैंभी अपने लोगोंको बुला तुझे साथ ले
चलूंगा. और उसे तुझे दिलाऊंगा तू अपने मनमें किसी बातकी
चिंता मत्कर मैने तुझसे यह बचन किया. तब विप्र अपने
खाने पीने लगा और राजाने प्रधानको बुलाकर आज्ञा की कि,
मेरे डेरे नगरके बाहर निकालो चार घडीके बाद कामनगरकी
तरफ मेरा कूच है इस वास्ते सबको खबर दो. इसमें कितनी
एक देरके पीछे राजाभी तैयार हो विप्रको साथ ले कूचकर डेरोंमें
जा दाखिलाआ. और जितने राजाके नौकर थे वह सब रिका-
बमें हाजिर थे राजा वहांसे कूच दरकूच जाताथा, कितने एक
मंजिलोंके बाद कामा नगरी दस कोस इधर डेरा किया.