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सर्वकोश
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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पृष्ठ 105

सोलहवीं पुतली १६. ( १०३ )

पहुँचो. सेठ यह सुनकर बोला-मेरीभी यही इच्छा थी कि, पुत्रीका
ब्याह मैं कहाँ करूंगा ? पर भगवानने घर बैठेही संयोग कर
दिया. फिर कहा कि-कुछ दिन तुम यहां आराम करो, मैं
अपना पुरोहित तुम्हारे साथ कर दूंगा. वह लड़केको देख
टीका जाकर देगा और तुमभी इस लड़कीको देखलो. और वहां
जाकर उस सेठसे कहो कि, अपनी आँखों देख आयाहूं. वह
ब्राह्मण कितनेक दिनोंतक वहां रहा और उस कन्याको अपनी
आंखोंसे देख सेठके ब्राह्मणको साथ ले उज्जैन नगरीको फिर चला
तब उस सेठने अपने पुरोहितसे कह दिया कि, टीका दे ब्याहकी
तैयारी जल्दी कर आना. ये दोनों वहांसे चल जहाजपर चढ़
कितनेक दिनोंमें उज्जैन नगरीमें आन पहुँचे. ब्राह्मणने सेठको खबर
दी कि, मैं कन्या ठहरा आयाहूं. सेठने दूसरे दिन उस ब्राह्मणको
बुलाया और लड़केको अपने पास बैठा दिखलाया. ब्राह्मणने
देख उसे तिलक कर दिया. और हाथ जोड़ अपने सेठकी तरफसे
बिनती कर कहा कि-आप जल्दीसे बरात लेकर आइये. हम जाकर
वहां तैयारी करते हैं. ऐसा ठहराकर फिर रुखसत हो वह
ब्राह्मण अपने मुल्कको गया. वहां जा सेठसे यहाँका सब
समाचार कहा. सेठ यह खबर सुनकर ब्याहका सामान तैयार
करने लगा. और इधर यह सेठ ब्याहकी तैयारी करने लगा.
कारखानेमें नौबत बजने लगी, और मंगलाचार होने लगा.