सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
इस ग्रन्थ के बारे में
'गोलाध्याय' भास्कराचार्य के 'सिद्धान्तशिरोमणि' का चौथा भाग है, जिसमें गोलीय खगोल अर्थात् पृथ्वी, आकाश और ग्रह-कक्षाओं के ज्यामितीय रूप का विवेचन है। यहीं भुवनकोश में भास्कराचार्य पृथ्वी के गोल होने, उसके किसी आधार पर न टिके होने, और उसकी आकर्षण-शक्ति से भारी वस्तुओं के उसकी ओर गिरने का उल्लेख करते हैं; यह प्रसंग भारतीय विज्ञान के इतिहास में बहुत उद्धृत होता है। ग्रन्थ में भास्कर ने अपनी ही 'वासनाभाष्य' टीका से गणनाओं के कारण (उपपत्ति) भी समझाए हैं।
इस संस्करण में मूल पाठ के साथ भास्कराचार्य का स्वोपज्ञ वासनाभाष्य, मुनीश्वर (उपनाम विश्वरूप) का 'मरीचि' भाष्य, और पं. केदारदत्त जोशी की उपपत्ति सहित हिन्दी व्याख्या है। पं. जोशी गणित और फलित, दोनों में ज्योतिषाचार्य थे और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभाग से सेवानिवृत्त प्राध्यापक थे। मोतीलाल बनारसीदास ने इसे १९८८ में पहली बार प्रकाशित किया।
विषय-क्रम में गोल-प्रशंसा, भुवनकोश, मध्यगति-वासना, छेद्यक, गोलबन्ध, यन्त्राध्याय (नाड़ीवलय, यष्टि, चक्र और फलक यन्त्र बनाने की विधि), ऋतु-वर्णन और प्रश्नाध्याय आते हैं। आकृतियों सहित ७२३ पृष्ठों का यह खण्ड ज्योतिष के विद्यार्थियों के लिए है।
shape.
Now look at line 13: the letter has that exact same top shape as 'ह'! But instead of 'ि', it has 'ु' below: 'हु'.
Wait, what about the dot after 'हु'? There is no dot. So it's "स्वल्पान्तत्वान्मुहुकर्म" or "स्वल्पान्तत्वान्मुदुकर्म". Wait, looking at the center, it really looks like 'द' + 'ु' = 'दु' because the curve is smooth like 'द' in 'सूत्रादिवाशङ्कुतलं' (line 5). If it is 'द', it's a typo for 'हु'. Let's look at it: "स्वल्पान्तत्वान्मुदुकर्म" vs "स्वल्पान्तत्वान्मुहुकर्म". Actually, "स्वल्पान्तत्वान्मुदुकर्म" is what a literal typist would have set if the font sorted 'द' instead of 'ह', or maybe it is 'हु' with a worn lead type.
स्वगोऽङ्गेषुषडंशेन ६ १६ १९९
स्फुटोनशीघ्रोच्चयुतौ ७ २५ २६१
स्युलंम्बन कला नाड्यो ९ २७ ३४८
स्वकुसुमैर्मलिनामिव १३ २ ४९५
स्वतनूजवनराज्या १३ ८ ५०३
स्याद
Indological Truths
श्रीमद्भास्कराचार्यविरचित
सिद्धान्तशिरोमणेः
गोलाध्यायः
व्याख्याकार श्री पं० केदारदत्त जोशी
[चित्र विवरण:]
र
रवि कक्षा
दृ
च पृष्ठीय क्षितिज
ज ह
गर्भीयक्षितिज
ल थ भू प
म
भूबिम्ब
य