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सर्वकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

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( ९० )
(४२) "पद्मावत" १-३ खण्ड । (४४) माधव पञ्चक । (४४) राधाकृष्ण रामलीला
(४५) तुलसीदास जी की विनय पत्रिका का संस्कृत में अनुवाद । (४६) श्री "भारतेन्दु"
हरिश्चन्द्र की जन्म पत्री (नागरी प्रचारिणी में है । मुद्रित है ।)
क्वीन्स कालेज बनारस में इस समय गणित की स्पेशल कक्षायें चलती थीं ।
मैथेमेटिक्स और इण्डियन ऐष्ट्रानामी (Indian Astronomey) की कक्षाओं की शिक्षण
देने का गुरुतम कार्य श्री सुधाकर जी को ही सौंपा गया । वैदुष्य के गाम्भीर्य एवं उच्च-
स्तर के लेक्चरों से प्रभावित होकर बड़े बड़े अंग्रेज भी द्विवेदी जी की गुण गरिमा पर
भक्ति प्रदर्शित करने लगे थे ।
१६वीं शताब्दी से आज तक के ग्रहगणितज्ञों में सुधाकर द्विवेदी के ही शोधपूर्ण देन-
अध्ययन अध्यापन ग्रन्थ लेखन, प्राचीन महत्त्व के अप्रकाशित ग्रन्थों का प्रकाशन, उनपर
उनके अप्रतिम व्याख्यान जो विश्वविश्रुत हैं और प्रत्यक्ष भी हैं जिनका मुक्त कण्ठ से
सभी भारतीय विद्वानों का हार्दिक से समादर आज भी होता आ रहा है ।
तदुपरि सुधाकर द्विवेदी की शिष्य परम्परा के प्रातः स्मरणीय मेरे पूज्य १०८
श्री गुरुचरण पं० बलदेव पाठकजी, गणित खगोल विद्या के अप्रतिम प्रभावशाली श्री पं०
गेंदालाल चौधरी, गुरुजी के ज्येष्ठ सुपुत्र स्वर्गीय मेरे गुरुभाई श्री पं० गणेशदत्त पाठक,
श्री पं० मुरलीधर झा, श्री पं० बलदेव मिश्र, पं० अच्युतानन्द झा प्रभृति प्रसिद्ध खगोल
ग्रहगणितज्ञ जो इस संसार में भौतिक रूप से नहीं रह गये किन्तु यथोचित उन लोगों के
शोधपूर्ण कतिपय ग्रन्थ भी प्रकाशित एवं उपलब्ध भी हैं ।
काश ! यह बीसवीं शताब्दी इस दिशाक्रम से क्यों विमुख हो गई यह शोचनीय है ।
ऐसे ग्रहखगोलज्ञ विश्वविख्यात उक्त सुधाकर जी की फलित ज्योतिष पर कितनी
आस्था थी (नहीं थी) विज्ञ पाठक इनसे विरचित "गणकतरङ्गिणी" ग्रन्थ का अन्तिम
भाग उपसंहार "आधुनिकाः ज्योतिर्विदः फलमात्रैकवेदिनः" देखकर समझ सकेंगे कि
गणित स्कन्ध ज्ञानपूर्वक ही फलित का सदुपयोग होना चाहिए ।
(महामहोपाध्याय पं० सुधाकर द्विवेदी के जीवन और कृतित्व के पूर्ण विवरण के
सन्दर्भ में "म० म० पं० सुधाकर द्विवेदी का जीवन एवं कृतियाँ" लेखक—केदारदत्त
जोशी देखें ।)
शङ्कर बालकृष्ण दीक्षित—
ज्योतिष विषय के आमूल चूड वेद, पुराण, श्रुति, स्मृति के आधार से सिद्धान्त,
संहिता और होरा तीनों स्कन्धों का सुन्दर विवेचन श्री शङ्कर बालकृष्ण दीक्षितजी ने
अपने 'भारतीय ज्योतिष' नामक रचित ग्रन्थ में किया है जो हिन्दी प्रकाशन ब्यूरो
लखनऊ से प्रकाशित है और जिसमें प्रारम्भ से श्री पं० सुधाकर द्विवेदी तक के खगोल