सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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किया था । शक सम्बत ८८८ सन् ईसवी ९६६ चैत्र शुक्ल पञ्चमी गुरुवार के दिन इन्होंने
(सृष्टि से सन् ९६५ तक के दिनों की संख्या) अहर्गण बनाया । इसी अहर्गण पर डा०
श्री कर्न महाशय ने इन्हें 'भारतभूषण' की पदवी दिला दी थी । इन कारणों से इस बीच
गणितज्योतिष पर विद्वानों की आस्था स्थिर एवं सुदृढ़ हो रही थी ।
महामहोपाध्याय पं० श्री सुधाकर द्विवेदी—
गुरुणां गुरु महामहोपाध्याय पं० सुधाकर द्विवेदी का जन्म सन् १८५५ ई० में वरुणा
नदी के तट पर श्री काशी (खजुरी) में हुआ था । बाल्यावस्था में दुर्गादत्त जी से पाणि-
नीय व्याकरण के अध्ययन के बाद त्रिस्कन्ध ज्योतिर्वित्ता श्री देवकृष्ण जी से लीलावती
(ज्योतिष) पढ़ने लगे तथा महामहोपाध्याय श्री बापूदेव शास्त्री जी से गणित ज्योतिष का
अध्ययन किया ।
इस प्रकार सन् १८५५ से १९१० ई० तक निरन्तर अध्ययन अध्यापन और गणित
गोल के अनेक ग्रन्थों पर शोधपूर्ण व्याख्या, उपपत्ति के साथ-साथ संहिता होरा स्कन्धों
पर भी सविशेष शोधात्मक सुव्याख्यान के साथ स्वरचित स्वतन्त्र ग्रन्थों से स्कन्ध
त्रयात्मक ज्योतिष धरातल में तब से आजतक सुधाकर द्विवेदी का स्थान इकाई पर ही है।
पं० बापूदेव शास्त्री जैसे विख्यात गणितज्ञ के सान्निध्य से तथा सरस्वती भवन के
पुस्तकालय के कर्मचारी होने से भी, अनेक ग्रन्थों के अवलोकन मनन पठन आदि की
गणित शास्त्र की विलक्षण प्रतिभा से विद्वानों को आकृष्ट करने वाली सुधाकर की असा-
धारण प्रतिभा भी उन्हीं दिनों शास्त्रीय विवादों के गहन शास्त्रार्थों में यत्र तत्र सुनाई
दे रही थी, एक अध्यापक के रूप में और दूसरे छात्र के रूप में शास्त्रीय संघर्ष
उत्तरोत्तर वृद्धिगत था । श्री सुधाकर जी ने संस्कृत वाङ्मय के ज्योतिषशास्त्र का संस्कृत
भाषा के माध्यम के साथ ही साथ हिन्दी भाषा की भी सराहनीय पाण्डित्यपूर्ण योग्यता
प्राप्त करते हुए आँग्ल भाषा पर भी अपना पर्याप्त अधिकार कर लिया था ।
गणित ज्योतिष के सिद्धान्त ग्रन्थों के एक से एक नवीन परिष्कारों से इनके मस्तिष्क
में एक अभेद्य गढ़-सा बन गया था । गवर्नमेण्ट संस्कृत कालेज के अध्यापक ज्योतिषियों
से पढ़ने के बाद सभी छात्र इनके पास आने लग गए थे और इन्होंने सबको निःशुल्क
पढ़ाने का कार्य आरम्भ कर दिया था । सुदूर, बंगाल, मिथिला, गुजरात, काश्मीर,
नैपाल, कूर्माचल, प्रभृति देश देशान्तर के शिष्यों में सुधाकर जी कि शास्त्रीय गुरुगरिमा
व्याप्त हो गयी थी ।
ज्योतिष शास्त्र के सिद्धान्त ग्रन्थों के अध्ययनाध्यापन के साथ उनका प्रकाशन भी
प्रारम्भ हुआ । इस समय गवर्नमेण्ट क्वीन्स कालेज बनारस के गणित तथा अंग्रेजी के
योग्य विद्वान् डा० जी थीबी महोदयजी थे । श्री सुधाकर ने अपने अदम्य उत्साह एवं