सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

पृष्ठ 88, कुल 723 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 88

( ८१ )

ग्रन्थ की स्वाशय प्रकाशिनी नाम की टीका भी स्वयं मुनीश्वर ने लिखी। इसके अलावा
आचार्य मुनीश्वर ने निष्ठार्थदूती नाम की लीलावती की टीका, पाटीसार नामक स्वतन्त्र
ग्रन्थ एवं भास्कराचार्य कृत सिद्धान्तशिरोमणि की 'मरीचि' नाम की टीका लिखी।
मरीचि भाष्यकार, आचार्य मुनीश्वर भास्कराचार्य के परम भक्त थे, उन्होंने
सिद्धान्त सार्वभौम में स्वयं कहा है—
"गूढं स्थूलं स्व सिद्धान्तं मत्वा यस्तच्छिरोमणिम्।
कृतवान्मनुजव्याजादसौ जयति भास्करः।"
'भास्कराचार्य मनुष्य रूप से अवतरित हैं।' ऐसा उक्त कथन से स्पष्ट है। भास्करा-
चार्य के प्रति मुनीश्वर की यह अनुपम भक्ति, ग्रहगोल मर्मज्ञ सिद्धान्त तत्व विवेककार
'भट्ट कमलाकर' को रुचिकर नहीं हुई। जिसका परिणाम यह भी हुआ कि कमलाकर भट्ट
के छोटे भाई श्री रंगनाथ ने मुनीश्वर कृत क्षेत्रभङ्गी का कमलाकर की आज्ञा से खण्डन
कर दिया। इस खण्डन का भी खण्डन प्रकार मुनीश्वर का उपलब्ध है एवं किंवदन्ती जो
सही है कि माघ मेला प्रयाग के कुम्भ के अवसर पर जहाँ भारत दिग्दिगन्त के महामनीषी
शास्त्र पारंगतों में शंकराचार्य प्रभृत्ति सभी आचार्यों का समागम होता है, वहीं उसी अव-
सर पर आचार्य मुनीश्वर एवं भट्ट कमलाकर में आचार्य भास्कर की 'सिद्धान्तशिरोमणि'
ग्रन्थ के विषय पर-परस्पर दीनों में शास्त्रार्थ खण्डन-मण्डन हुआ। भारतीय खगोल ग्रह
गणितशास्त्र के लिए यह घड़ी उत्तम रही। क्योंकि इस शास्त्रार्थ के पश्चात् ही आचार्य
मुनीश्वर ने 'सिद्धान्तशिरोमणि' ग्रन्थ की अनुपम 'मरीचि' टीका लिखी एवं भट्ट कमला-
कर ने खगोल ग्रहगणित के बृहद्-आकर ग्रन्थ 'सिद्धान्ततत्वविवेक' की रचना कर
भारतीय ज्योतिष को आगे वर्द्धमान किया। सम्भवतः मुनीश्वर एवं कमलाकर भट्ट का
उक्त शास्त्रार्थ भास्कराचार्य से आविष्कृत उदयान्तर ग्रह गणित कर्म में हुआ होगा।
वस्तुतः भास्कराचार्य से आविष्कृत यह उदयान्तर गणित कर्म अकाट्य है, अखण्डनीय है
एवं ग्रह गणित में आचार्य भास्कर की सुसूक्ष्म देन है।
'सिद्धान्तशिरोमणि' की आचार्य मुनीश्वर की 'मरीचि' नाम की तो टीका है,
किन्तु प्राचीनों के बहुत मतों के साथ-साथ ग्रहगोल का निःशेष पाण्डित्य और अनेक
सूक्ष्म कथनों के साथ अत्यन्त सुन्दर न्याय (तर्क) शास्त्र की सरिणी से 'सिद्धान्तशिरो-
मणि' का ऐसा सुन्दर उत्तम भाष्य अभी तक यही 'मरीचि' सिद्ध हुई है। पण्डित
परम्परा में 'मरीचि' ने टीका नाम से प्रसिद्धि नहीं पाई है अपि च इस मरीचि टीका
ने भी ग्रहगणित गोल का एक ग्रन्थ रूप से अपना नाम सार्थक किया है। मेरे मत से,
आचार्य मुनीश्वर कृत 'सिद्धान्तशिरोमणि' की 'मरीचि' टीका जो विशेष प्रसिद्धि पा
चुकी है वह ग्रहगणित का अशेष पाण्डित्य सूचक एक सर्वोत्तम ग्रहगोल भाष्य कहा
जाना चाहिये।
६