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सर्वकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

पृष्ठ 699, कुल 723 में से

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? No, त् + क = त्क?
Wait! "कश्चित् त्वाह" -> "कश्चित्त्वाह"?
Let's look at it:
क (ka)
श्चि (shci)
त्क (tka) or त् (t) + था (thaa)?
Wait, look at letter 3: it is 'त' with something?
Wait! "कश्चित्" then "तथाऽऽह-"!
"कश्चित् तथाऽऽह-"!
LET'S LOOK AT THAT:
क
श्चि (shci)
त् (t) - wait, is there a virama?
Look at the third character: it is 'त्' or 'त'?
Wait, no: "कश्चित् तथाऽऽह" -> क-श्चि-त्त-था-ऽऽ-ह!
Look at:

  1. क
  2. श्चि
  3. त् (or त्क?)
    Wait, look at the third character:
    It's a 'त' merged with 'क'?
    Wait, no, look at line 9: "कस्यचित्कल्पिताध्यायस्य".
    In line 9: "कस्यचित्" has 'क', 'स्य', 'चि', 'त्'.
    Here in line 16:
  4. क
  5. च्छि or श्चि?
    Wait, "कश्चित्" -> क