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सर्वकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

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पृष्ठ 67

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साधित महाशंकु में जिस ग्रह की छाया ज्ञात करनी है उस ग्रह की गति का पञ्चदशांश
(पन्द्रहवाँ भाग) उस ग्रह शंकु में कम करने से शेष तुल्य स्पष्ट शंकु मान होता ।
लघु शंकु साधन में यदि लघु ज्या से साधित शंकु में ग्रहगणित का ४३० वाँ भाग
कम करने से वह स्पष्ट लघु शंकु होता है ।
उक्त दोनों प्रकारों से साधित शंकुओं से साधित दृग्ज्या को १२ से गुणा कर साधित
शंकुओं से भाग भाग देने से छाया का मान स्पष्ट होता है । तब छाया² + १२² =
कर्ण² का मूल छाया का मान स्पष्ट होता है । पूर्वाचार्यों का यहाँ पर का गर्भीय गणित
कहने के लिये स्थूल कहा जा सकता है जिसे स्वल्पान्तर या नगण्य दोष भी कह
सकते हैं ।
चन्द्र बिम्ब की दृश्यता काल साधन में हो तो उक्त संशोधन आवश्यक होगा ।
क्षेत्र देखिये—
[चित्र:
ख (शीर्ष)
ग्र (ग्रह-बिम्ब)
क समानांतर क्षितिज
१२ च पृष्ठीय क्षितिज
पृ
गर्भीय क्षितिज
ल' ल भू]
(ल भू × १२) / वि ल = इष्ट छाया, अर्थात् (दृग्ज्या × १२) / गर्भीय शंकु
किन्तु गर्भीय शंकु - लम्बन कला = भू पृ की कला ।
अतः (दृग्ज्या × १२) / पृष्ठीय शंकु = इष्ट समय में छाया ।
वस्तुतः इष्ट छाया साधन में गर्भीय शंकु = पृष्ठीय शंकु मान कर प्राचीनों के छाया
साधन में कुछ स्थूलता कहने को हो जाती है जिसे "स्वल्प की आन्तरित त्रुटि जो