सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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स्थानीय शर का भी संस्कार करना चाहिए" "ऐसा मत" यह मत मेरा नहीं है। यह
मत पूर्ववर्ती मेरे माननीय ब्रह्मगुप्ताचार्य का है। अतएव मेरे मत से चन्द्रदृक्क्षेप में वित्रिभ
लग्न शर का संस्कार नहीं करना चाहिए।
क्यों नहीं करना चाहिए ?
इसलिए युक्ति देता हूँ कि २४ अक्षांशीय देशों में उदय काल में तुला राशिस्थ सूर्य
चन्द्र और पात भी हैं। पूर्वापर वृत्तानुसारि कान्ति वृत्त में यह स्थिति होती है। यहाँ
ऐसी स्थिति में रवि प्राक्स्वस्तिक में तथा वित्रिभ लग्न सममण्डल, खमध्य में है कान्ति-
मण्डल और दृङ्मण्डल ये तीनों वृत्तों का एक ही स्वरूप है, या ये एकाकारक हैं। स्पष्ट
शर भी यहाँ शून्य है एवं यहाँ शर का अभाव है।
इस नति का यहाँ तथा वित्रिभ लग्न के शर से संस्कृत नति का यहाँ पर ४ कला
के तुल्य जो माना जाता है वह सब व्यर्थ है अर्थात् प्रयोजनाभाव है इत्यादि युक्तियों से
वित्रिभ शर संस्कृत नति का प्रयोजनाभाव होने से ब्रह्मगुप्ताचार्य का मत समीचीन नहीं
है यही आचार्य भास्कर का भाव है।
क्षेत्रगत वासना के साथ उदाहरण सहित आचार्य ब्रह्मगुप्ताचार्य के मत की
असमीचीनता का स्पष्टीकरण कर रहा हूँ। जैसे—यद्यपि ब्रह्मगुप्त के ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त
को आगम मान कर भास्कराचार्य ने इस ग्रन्थ का प्रणयन किया है तथा ब्रह्मगुप्त
के गोलगणित के वैदुष्य पर भास्कराचार्य ने बड़ी आस्था यत्र तत्र सर्वत्र भी प्रगट की है
किन्तु महान् गणितज्ञों की भी गणितगोल की स्थूलता का आचार्य ने सदोष उल्लेख
करते हुए इसकी सूक्ष्मता के गणित उपायों की अच्छी विधि हम लोगों को दी हैं।
यहाँ पर चन्द्रदृक्क्षेप साधन में वित्रिभ लग्न शर का संस्कार प्रत्यक्ष बाधक और
व्यर्थ भी है आचार्य ने यही बताया है।
आचार्य ने वस्तु तथ्य को सामने रखा है और स्थूल पक्ष जो मैंने कहा है वह पूर्व
परम्परा से लिखा हूँ। यह मेरा स्वतन्त्र मत नहीं है इत्यादि कहते हुए अपने पूर्व के
आदरणीय श्री ब्रह्मगुप्ताचार्य का दोष निम्न भाँति स्पष्ट किया है—
कल्पना करिये कि—
सं पू स प = क्षितिज वृत्त हैं ।
सं ख नि स = याम्योत्तर वृत्त है ।
पू ख प = पूर्वापर वृत्त है ।
पू नि प = विषुव वृत्त है ।