सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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ानोत्पन्न कुत्सित अहंकार के
ज्योतिर्विद के लिये संश्लिष्ट कुट्टकादि गणितविद् सिंह सदृश सर्व सामर्थ्यवान् है । यही
भाव है ॥११०॥
अथास्य भङ्गः—
कृताष्टाष्टिगोब्ध्यब्धिशैलामर्तु-
द्विप ८६३३७४४९१६८४घ्ने सशेषाधिमासावमैक्यै
भवेदृक्षकचन्द्राह १६०२९९८९९९९९९ भक्तेऽवशेषं
गतेन्दुद्युराशिस्ततः सावनाद्यः ॥१११॥
वा० भा०—स्पष्टार्थम् ॥१११॥
मरीचिः—अथ सूचितमुत्तरं भुजंगप्रयातेनाऽऽह—कृताष्टाष्टीति ।
सशेषाधिमासावत्रैक्ये । स्वस्वशेषाभ्यामधिमासावमशेषाभ्यां सहिते । स(स्व)शेषे ।
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"कृताष्टाष्टिगोब्ध्यब्धिशैलामर्तु-" (line 27)
"द्विप ८६३३७४४९१६