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सर्वकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

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पृष्ठ 588

४८६ गोलाध्याये
मैं (भास्कराचार्य) मानव शरीरी तुमको इस भूमण्डल में अतीन्द्रिय ज्ञान सम्पन्न
सर्वज्ञ कहूंगा ।
उदाहरण—जल में प्रतिबिम्बित बांस वेध से कोटि = ३ अंगुल, भुज = ४ अंगुल,
ऊपर स्थित बाहु = ११ अंगुल और कोटि = ८ अंगुल, दृगुच्छ्रितियां = ३ हाथ और
१ हाथ तो बांस की ऊँचाई और आत्मवंशान्तरित भूमि का मान बताओ ।
ऊर्ध्व वेध से कोटि = ३, भुज = ४, बैठे हुये वेध से कोटि = ८ भुज = ११, दृष्टा
की ऊँचाइया क्रमश: ७२, २४ पूर्ववत् आत्मवंशान्तर भूमि = ७८ हाथ, बांस की
ऊँचाई = ६३ ऊर्ध्व वेध और अधोवेध में यष्टिमान भिन्न होते हैं ।
उपपत्ति—समान भित्ति में एक दीर्घ सरल रेखा ऐसी हो जो जलसम समतल
धरातल गामिनी होती हो । उसके एक छोर पर एक लम्बवत् ऊर्ध्व रेखा करनी
चाहिए इसी में बांस की ऊँचाई का मान होगा बांस के मूल से नीचे वंश प्रमाण की
एक अन्य रेखा करनी चाहिए । यही वंश की प्रतिबिम्ब रेखा होगी ।
पूर्वकृत भू रेखा के ऊपरी छोर पर दृष्टि उच्छ्रिति तुल्य एक और अन्य रेखा करनी
चाहिए । तथा दृष्टि की उच्छ्रिति से प्रतिबिम्बित वंश रेखा तक कर्ण रेखा करनी
चाहिए कर्ण और भूरेखा के सम्पात बिन्दु पर जल में वंश के अग्र भाग को दृष्टा देखता
है । अतः जल के दोनों तरफ दो त्रिभुज होते हैं, जल और वंशमूल = भुज, प्रतिबिम्बित
वंश = कोटि, कर्ण का अधो खण्ड = कर्ण, आत्मजलान्तर = भुज, दृगुच्छ्रिति = कोटि ।
ऊर्ध्व कर्ण खण्ड = कर्ण । ये त्रिभुज परस्पर सजातीय होते हैं, जो यष्टिवेधित भुज कोटि
के तुल्य होते हैं । इसलिये वंश के जलस्थ प्रतिबिम्ब से भी पूर्ववत् अनुपात द्वारा वंश
की ऊँचाई आदि का ज्ञान कर ऊँचाई में दृष्टि की ऊँचाई को बांस की ऊँचाई में कम
करना युक्तियुक्त होता है क्योंकि प्रतिबिम्बित वंश की स्थिति जल में नीचे होतो है ।
॥४८॥४९॥
अथ स्वयंवाहमाह—
लघुदारुजसमचक्रे समसुषिराराः समान्तरा नेम्याम् ।
किंचिद्वक्रा योज्याः सुषिरस्याधः पृथक् तासाम् ॥५०॥
रसपूर्णं तच्चक्रं दूचाधाराक्षस्थितं स्वयं भ्रमति ।
वा० भा०—ग्रन्थिकीलरहिते लघुदारुमये भ्रमसिद्धे चक्र आराः । किवि-
शिष्टाः । समप्रमाणाः समसुषिराः समतौल्याः समान्तरा नेम्यां योज्याः । ताश्च
नद्यावर्तवदेकत एव सर्वाः किंचिद्वक्रा योज्याः । ततस्तासामाराणां सुषिरेषु
पारदस्तथा क्षेप्यो यथा सुषिरार्धमेव पूर्णं भवति । ततो मुद्रिताराग्रं तच्चक्रमय-
स्कारशाणवद्दृग्धारास्थं स्वयं भ्रमति । अत्र युक्तिः । यन्त्रैकभागे रसो ह्यारामूलं
प्रविशति । अन्यभागे त्वाराग्रं धावति । तेनाऽऽकृष्टं तत् स्वयं भ्रमतीति ॥५०॥