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सर्वकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

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पृष्ठ 578

४७६ गोलाध्याये
कोट्योः शुद्धयर्थं यष्टिमानकथनं न तु मूलाग्रवेधयोस्तुल्ययष्ट्यपेक्षार्थमिति ध्येयम् ।
यस्य वंशस्य मूलवेधे दोः । लम्बनिपातान्तरभूमिः षट्‌हस्ता । सर्वत्राङ्गुलानां सत्त्वाच्च-
तुश्चत्वारिंशदधिकशताङ्गुलो भुज इत्यर्थः । कोटिर्लम्बोच्च्यान्तरं सप्तदशाङ्गुलप्रमाणा ।
तस्यैव वंशस्याग्रवेधे भुजः षोडशाधिकशताङ्‌गुलानि कोटिः सप्ताशीत्यङ्‌गुलानि । एवं
भुजादिकज्ञानात्तन्मानं तद्भुजादिसंबन्धिनो वंशस्य प्रमाणं कथय ॥४३॥४४॥
केदारदत्तः—वंशादि वेध प्रकार—
यष्टि से इस प्रकार दो बांसों का वेध कर दृष्टि की ऊँचाई से भुज को गुणा कर
कोटि से भाग देने से लब्ध फल, अपने और बाँस के मध्य की भूमि का मान होता है ।
वंशाग्र भूमिमानको कोटि से गुणा कर, भुज से भाग देने से लब्ध फल को दृष्ट्यु-
च्छ्रिति में जोड़ देने से बाँस की ऊंचाई का ज्ञान होता है ।
उदाहरण से भी बताया जा रहा है—
यष्टि का मान = १४५, दृष्ट्युच्छ्रिति (दृष्टा की ऊँचाई) = ६८ हाथ, तलवेध
बाहु = भुज = १४४ कोटि = १७, अग्र वेध से भुज = ११६ कोटि = ८७ ।
उपपत्ति—वेधकर्त्ता और बाँस के बीच की भूमि = भुज दृष्ट्युच्छ्राय = कोटि, दृष्टि
और वंश के मूल में बद्ध सूत्र = कर्ण । इसी के अनुसार यष्टि वेध से पूर्ववत् अक्ष क्षेत्र
साजात्य क्षेत्र बनता है । जहाँ पर लम्बान्तर = भुज, लम्बोच्च्यान्तर = कोटि, और
यष्टि = कर्ण ।
अनुपात से कोटि में भुज तो दृगुच्छ्राय कोटि में फल = आत्मवंशान्तर भूमि ।
अग्रवेध से भी वंश मूल से ऊपर दृगुच्छ्रायमित अन्तर में चिह्न करने चाहिए । दोनों
दृष्टियों के अन्तर रेखा = भूमि चिह्न के ऊपर का बाँस खण्ड = कोटि, दृष्टि और वंशाग्र-
बद्ध सूत्र = कर्ण ।
अनुपात से—
वेध कोटि × भूमिमित भुज
────────────────────── = चिह्न से ऊपर तक बाँस खण्ड ।
वेध भुज में
दृष्ट्युच्छ्रिति + वंश खण्ड = बाँस मान उपपन्न होता है ।
गणित के उदाहरण से यथा—
मूलवेध में भुज = १४४, दृष्ट्युच्छ्रिति = ६८
१४४ × ६८ = ९७९२ में मूलवेध कोटि १७ से भाग देने से ५७६ उपलब्ध हो
जाता है ।
अग्रवेध कोटि × १४४
तथा ────────────────── = ४३२ वंश की ऊँचाई ।
अग्रवेध भुज
बाँस की ऊँचाई + दृगुच्छ्रिति = ४३२ + ६८ = ५०० । समग्र बाँस की ऊँचाई का
मान उपलब्ध होता है ॥४३॥४४॥