सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

पृष्ठ 559, कुल 723 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 559

यन्त्राध्यायः ४५७

स्तच्चिह्नान्तराले दिनशेषघटिकाः । अतः सूर्यबिम्बस्य दूरस्थितत्वातदनुकल्पेनाभीष्टकाले
सूर्यस्थानज्ञानार्थं यष्टिः केन्द्रे सूर्याभिमुखा धृता । सा तु त्रिज्यापरिमिता । सूर्यभूगर्भ-
योरन्तरे त्रिज्यात्वात् ।
तत्र भूगर्भज्ञानाद्वृत्तकेन्द्रमेव भूमध्यं भूपृष्ठस्थे कल्पितम् । भूपृष्ठीयकालस्यापेक्षित-
त्वाच्च । तस्याः सूर्याभिमुखत्वसंपादनार्थं नष्टच्छायात्वमुक्तम् ।
तत्र यष्ट्यग्रसूर्योदयस्थानसक्तद्युज्यावृत्तमाकाशे कर्तुमशक्यमिति भुवि केन्द्रादेव
द्युज्यावृत्तं लिखितम् । तत्र घटिकाज्ञानार्थं यष्ट्यग्रोदयस्थानान्तराले सूत्रं द्युज्यावृत्ते
संपूर्णज्यालेखितद्युज्यावृत्ते षष्टयङ्किते देया । तद्धनुषि घटिका दिनगताः । यष्ट्य-
ग्रास्तस्थानान्तरालसूत्ररूपसंपूर्णज्यादानावगतधनुषि घटिका दिनशेषाः । तत्र ज्याग्रान्तराले-
ऽत्यल्पं वृत्तखण्डं धनुः । उत्तरगोले त्रिंशदधिकघटीज्ञानार्थं महद्वृत्तखण्डं धनुरित्येतल्लाभार्थं
प्राक्पश्चादित्यत्र पूर्वमावृत्त्या सम्यग्व्याकृतमिति ध्येयम् ।
अथ प्रतिक्षणं द्युरात्रवृत्तभेदा(द)यष्ट्यग्रसूर्योदयस्थानान्तरसूत्रस्यैकद्युरात्रवृत्ते संपूर्ण-
ज्यात्वासंभवाल्लिखितद्युरात्रवृत्ते तद्दानेन घटीज्ञानमयुक्तमिति चेन्न ।
दिनगतार्थं भूपृष्ठसूर्योदयकालिकां शेषा(शा)र्थं च भूपृष्ठसूर्यास्तकालिकां प्रथमक्रान्ति-
ज्यां द्युज्यां प्रसाध्योक्तरीत्या घट्यः साध्यास्ततस्तत्कालिकां द्युज्यामग्रां प्रसाध्य तदग्रां
त्रिज्याद(वृ)त्ते यथायोग्यं दत्वा तद्द्युज्यावृत्तं च कृत्वा तत्पूर्वयष्ट्यग्रादुक्तरीत्या घट्य-
स्ततोऽपि तात्कालिकां द्युज्यामग्रां प्रसाध्योक्तदिशा पूर्वयष्ट्यग्रादेव घट्य इत्यसकृद्यावद-
विशेष इत्यवधारणात्स्वल्पान्तराद्धोक्तस्य युक्तत्वात् ।।२८-२९-३०।।
केदारदत्तः—यष्टि यन्त्र की रचना बताई जा रही है—
पारा (पारदा)या जलादि से समतल समान भूमि पर त्रिज्या व्यासार्ध से एक वृत्त की
रचना कर दिक्साधन के अनन्तर पूर्वविन्दु और पश्चिमविन्दु से उत्तर दक्षिणगोल क्रम को
समझ कर तत्कालीन अग्रा में ज्या की तरह अग्रादान करना चाहिए । अग्राग्र विन्दुगत
सूत्र का नाम स्वोदयस्त सूत्र होता है । त्रिज्यावृत्तान्तर्गत उसी केन्द्र से द्युज्या व्यासार्ध
से अन्य और एक वृत्त की रचना कर इस वृत्त में ६० घटिकाओं के चिह्न १-२-३ क्रम
से करने चाहिए । केन्द्र में त्रिज्याङ्गुलात्मका यष्टि का मूल केन्द्र लग्न कर यष्टि का
अग्रभाग सूर्याभिमुख ऐसे रखना चाहिए जिससे यष्टि की छाया ही न हो सके ।
पूर्व दिशा में त्रिज्यावृत्तगत अग्राग्रचिह्न और यष्टि के अग्रभाग के चिह्न के बीच
की जगह को अंगुल से माप की शलाका को जीवा की तरह निवेशित कर इन दोनों
शलाकाओं के बीच में वृत्त का जो चाप होगा उसमें १-२-३ जो घटिकाएँ इष्ट समय
में होंगी वही दिन गत घटिका होती हैं ।
उपपत्ति—भूमि गत त्रिज्या वृत्त = क्षितिज वृत्त ।
यष्टि = त्रिज्या