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सर्वकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

पृष्ठ 53, कुल 723 में से

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पृष्ठ 53

( ४६ )
भास्कराचार्य के एक ब्रह्म दिन सम्बन्धी अभ्रभ = नक्षत्र भ्रम = भ्रमण = १ चक्कर
में एक कल्प सम्बन्धी भू दिन = मानव दिन कम कर देने से दोनों का अन्तर निम्न है—
१५ ८२ २३ ६४५
१५ ७७ ९१ ६४५
× × × ४३२०००
इन्हीं सावन दिनों में एक सावन दिन सम्बन्धिनी सूर्यग्रह की (या किसी ग्रह की) गति
को कल्प सम्बन्धी सावन दिनों से गुणा करने से एक सावन दिन सम्बन्धिनी रवि
गति × कल्प सावन दिन = १ कल्प की रवि गति विकलादि होंगी । विकला कलादिकों
को राश्यात्मक बनाकर राशियाँ १२ से अधिक होने पर राशियों में १२ का भाग देने
से ४३२००००००० एक कल्प में ग्रहों के कक्षावृत्त की भगण संख्या होती है ।
इस मूल सिद्धान्त के आधार से रवि के इतने चक्कर पूरे होते हैं । भास्कराचार्य ने
ग्रहगणिताध्याय मध्यमाधिकार में एवं ग्रहगोलाध्याय के भुवनकोशाध्याय में ब्रह्माण्ड-
कक्षा का योजनात्मक मान भी बताया है । “कोटिघ्नैर्नखनन्दषट्क्···” इत्यादि से
१८७१२०६९२०००००००० यह ब्रह्माण्ड की (कटाहद्वय योगात्मक की एक परिधि के
तुल्य) परिधि बताते हुए अन्त में आचार्य ने ब्रह्माण्ड को इयत्ता इतनी ही है कहने में
संकोच करते हुए अपनी गणित गोल पद्धति के प्रामाण्य के आधार की ब्रह्माण्ड की उक्त
परिधि सटीक ठीक कही है और यह भी कहा है कि “करतलकलितामलकवदमलंसकलम्”
अर्थात् हाथ में सुस्थापित स्वच्छ आँवले के प्रत्येक अवयव के दर्शन की तरह जिसके
मस्तिष्क में सकल ब्रह्माण्ड गोल सुस्थिर सुदृढ़ परिपक्व है वही इस ब्रह्माण्ड का निर्णयात्मक
निर्णय दे सकते हैं इत्यादि कहते हुए ब्रह्माण्ड जितना भी है किन्तु ग्रह गणित सम्बन्धेन
कल्प कुदिन सम्बन्धी आकाश की परिधि का नाम ब्रह्माण्ड परिधि कहा गया है । ब्रह्माण्ड
परिधि या आकाश कक्षा से भी ग्रहों का ज्ञान आचाय ने किया है जैसे—स्व कक्षा ÷
ग्रह भगण = ग्रह कक्षा योजन अर्थात् सृष्टि आरम्भ से सृष्टि के अन्त अर्थात् एक कल्प
तक एक कल्प सम्बन्धी ग्रह गतियों का पुनः सम्मेलन काल = कल्प कुदिन संज्ञक से
अनन्त दूरगत आकाश परिधि का नाम ब्रह्माण्ड परिधि कहा गया है । आधुनिक खगोल
गणितज्ञ ब्रह्माण्ड के गवेषणात्मक शोध में तन्मयता से प्रवृत्त हो रहे हैं । भास्कराचार्य के
इस ब्रह्माण्ड कक्षा के शोध ज्ञान से उन्हें भी सहयोग मिल सकेगा ।
यह विषय गणिताध्याय और गोलाध्याय द'नों में यथावत् एक रूप का है ।
४. गोलाध्याय में मध्यगतिवासना—आकाशस्थ भू बिम्ब के बाहर अर्थात् पृथिवी
पृष्ठ से ऊपरी आकाश में १२ योजन = ४८ क्रोश, एक योजन लगभग = ५ मील है
और इससे ६० मील तक में भू वायु में बादल और विद्युत आदि के ऊपर के गोल में
शक्ति विशेष प्रवह वायु का स्थान है। इस प्रवह वायु में ऐसी महती शक्ति है कि इस