सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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जहाँ पर उदाहरणों में दो या अनेक वर्णों के गुणनफल से भावित य × क × ल...
य, क, ग उत्पन्न होता है। ऐसी स्थिति में किसी अभीष्ट इष्ट वर्ण को छोड़कर शेष
अव्यक्त वर्णों का मान व्यक्त मानकर समीकरणों के दोनों पक्षों में उक्त व्यक्तमान का
उत्थापन देकर तथा समीकरणों में समान जोड़ घटाओं, गुणा, भागादि कर बीज क्रिया
से अव्यक्त मान को व्यक्त किया जाता है। इसी को भावित....अर्थात् भावना से भावित
कहा गया है। उदाहरण में जैसे—
चतुस्त्रिगुणयो राश्योः संयुतिर्द्वियुता तयोः ।
राशिघातेन तुल्या स्यात् तौ राशी वेत्सि चेद्वद ॥
अर्थात् कोई दो राशियां हैं जिन्हें क्रमशः ४ और ३ से गुणाकर दोनों के गुणनफल में २
जोड़ देते हैं तो वह अंक संख्या उक्त दोनों राशियों के गुणनफल के तुल्य हो जाती है।
कल्पना से राशियाँ = अ और क, प्रश्नानुसार
४ य + ३ क + २ = य० क० भा० (भा० से भावित)
यहाँ पर क का मान कोई भी इष्ट मानें जैसे, क = ५, तो ४ य + ३ क + २ =
४ य + १७, य = १७, क = ५ प्रश्नानुसार—१७ × ४ + १५ + २ = ८५ =
१७ × ५ यदि क० का मान इष्ट ६ तो ४ य + २० = य ० ६ ∴ २ य = २०
∴ य = १०, क = ६ यहाँ भी १० × ४ + ६ × ३ = ४० + १८ = ५८ + २ =
६० = १० × ६ इस प्रकार किसी भी प्रश्न उत्तरों में गणितार्णव के आनन्त्य का
संकेत करते हुए "एवमिष्टवशादानन्त्यम्"—इष्ट कल्पना के आधार अनन्त मानों का
सही संकेत मिलता है ।
इस स्थल पर क का मान ५ ही क्यों, ४ क्यों न माना जाय ? ध्यान देने की
बात है कि यदि क = ४ तो, ४ य + ३ क + २, यदि क = ४ तो, ४ य + १४ =
४ य असम्भव है अतः क का मान ५ से अधिक यथेष्ट होता है ।
पुनः उदाहरण—वह ४ राशियाँ जिनके योग को २० से गुणा करने पर गुणनफल
चारों राशियों के गुणनफल के तुल्य हो जाता है वह चार राशियाँ कौन हैं ?
प्रथम राशि = य, शेष राशियाँ व्यक्त = ५, ४, २ अतः, ५ + ४ + २ = ११,
∴ य = ११ अतः चारों राशियाँ = ११, ५, ४ और २ होती हैं ।
२० (य + ११) = य × ५ × ४ × २ = ४० य अतः २० य + २२० = ४० य ।
२० य = २२० । य = ११ उत्तर उत्थापन से राशियाँ = ११, ५, ४, २ या २८,
१०, ३, १ या ५५, ६, ४, ० । इस प्रकार अनन्तमान होते हैं ।