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सर्वकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

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त्रिप्रश्नवासना २८९
केदारदत्तः—ब्रह्मदिन अर्थात् आप्रलयान्त सूर्य दर्शन—
पृथ्वी से अत्यन्त (अनन्त) दूर स्थित ब्रह्मा, आप्रलय पर्यन्त सूर्य दर्शन करता है अर्थात्
ब्रह्मा का एक हजार युग का एक दिन और एक हजार युग की एक रात्रि अर्थात् २ हजार
युग प्रमाण का १ दिन अर्थात् अहोरात्र होता है । दिनान्त के अनन्तर रात्रि शयन की तरह
ब्रह्मा १ हजार युग के दिनान्त में सारी सृष्टि का समापन कर एक कल्पतक शयन, करने
के उपरान्त पुनः नवीन सृष्टि रचना और दूसरे कल्प का प्रारम्भ करता है ।
क्षेत्र देखिये—
र जम य प ह = सूर्य कक्षा ।
ल म = दृश्यांश ।
च ह = दृ उ ।
भू = भूकेन्द्र य थ भू ग = भू बिम्ब ।
२४ अंश = जिनांश ।
दृश्यांश = ल म ।
जिनांश + कुच्छन कला = ज ल + ल म = योग ।
अनुपात से भू व्या ½ × त्रि
योग कोटिज्या
अतः योग—भू व्या द० = दृ उ = च दृ ।
अर्थात् विषुवद्वृत्त रूप गर्भ क्षितिज से नीचे २४ अंश तक दृश्यांश मान मानकर
इस से जो द्रष्टा की उन्नति च दृ तुल्य की भूगर्भ से ऊँचाई से द्रष्टा के दृष्टि पथ में
सदोदित सूर्य दर्शन होता रहेगा ।
अर्थात् मानव मान के एक सहस्र युग में आकाश कक्षा सम्बन्धीय क्षितिज में
सूर्य का अस्त पुनः इतने ही काल तक अन्धकार जिसे महा प्रलय कहते हैं होता रहता
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