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सर्वकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

पृष्ठ 378, कुल 723 में से

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पृष्ठ 378

महदह इत्याद्युक्तप्रश्नोत्तरमुपजाततिकयाऽऽह—"
Wait, look at "उपजाततिकयाऽऽह":
Is it "उपजातितिकयाऽऽह" or "उपजातिकयाऽऽह"?
Let's look at the letters:
उ प जा त िक या ऽ ऽ ह
Wait, is the 'त' before 'िक' doubled?
There is त, then another त with ि?
Yes, "उपजाततिकयाऽऽह—"

Line 14:
"अतश्च सौम्य इति । सौम्ये रव्युत्तरगोले। अतः स्वदेशे स्वनिरक्षदेशार्कोदयकालात्पूर्वमर्कोदयः"
Wait, look at "रव्युत्तरगोले।": is there a space before 'अतः'?
There is a space: "रव्युत्तरगोले। अतः"

Line 19:
"सूचनाथंकः ।" -> It has a repha on 'थ' and a dot/anusvara, let's keep "सूचनाथंकः ।"

Line 22:
"ऊर्ध्वे क्षितिजवृत्तादूर्ध्वस्थितद्युरात्रप्रदेशे दिनमानं स्यात् । अत एव युक्तं तस्याहोरात्रवृत्त-"

Line 25:
"केदारदत्त:—उत्तर गोल में चर तुल्य काल के अनन्तर पूर्व में सूर्योदय और"
Visarga with dash: "केदार