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सर्वकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

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( २४ )
सौकर्य के लिए वस्तुतः लिपियों के परिणाम दोनों या अनेकों अव्यक्त कल्पनाओं में
बात एक है भी तो प्राचीन आचार्यों की अव्यक्त कल्पना सविशेष महत्त्व की इसलिये है
कि प्राचीनों से सप्त सारथिः, सात बार, सात प्रकार के रंग लाल, पीला, हरा, श्वेतादि
सम्बन्धित कालक, पीतक, श्वेतक, इत्यादि रंग बोधक कल्पना की गई है ।
भास्करीय बीजगणित के एक वर्ण समीकरण से प्रश्न का हल
एक प्रश्न है कि—एक पुरुष का धन ३०० रु० और ६ घोड़े की पूंजी है तथा
दूसरे पुरुष के पास १० घोड़ों के साथ १०० रु० कर्ज (ऋण) देना है दोनों अर्थ विनिमय
से तुल्य हैं तो अश्व (घोड़ों) का मूल्य क्या होगा ?
घोड़ों का मूल्य अज्ञात होने से अव्यक्त कल्पना करते हैं अश्व (घोड़े) का मूल्य,
जैसे, घोड़े का मूल्य = य रुपया है अतः प्रश्न के अनुसार—
प्रथम का धन = ६ य + ३०० रु० ⎫ दोनों तुल्य धनी हैं अतः धनात्मक
दूसरे का धन - १० य - १०० रु० ⎬ ६ य को धनात्मक १० य में शोधन
६ य - ३०० = १०० य - १०० ⎭
करने से ६ य का मान ऋणात्मक हो जाने से १० य - ६ य, ४ य = ३०० + १०० =
४०० इस प्रकार ४ य = ४०० अतः य = ४००/४ = १०० = अश्व का मूल्य होता है ।
अतः य का अव्यक्त मान १०० रु० होने से प्रथम पुरुष का धन = ९०० के तुल्य
द्वितीय का भी धन ९०० दोनों तुल्य धन हो जाते हैं ।
और भी प्रश्न है—समतल समान भूमि में ३२ हाथ का एक बाँस खड़ा है वायु
वेग से यह एक जगह से टूट कर मूल से अग्रभूमि १६ हाथ की दूरी पर लग गया तो
बताओ बाँस अपने मूल से आगे कितने हाथ की दूरी पर टूटा था ।


[चित्र विवरण]

  • शीर्ष बिन्दु: ब
  • सम्पूर्ण ऊँचाई: ३२ हाथ
  • टूटने का स्थान: त्रुटित=त्रु
  • टूटा हुआ भाग (कर्ण): २०
  • शेष सीधा भाग (लम्ब):
    य
    १२
  • बाँस का आधार (पाद बिन्दु): मू
  • आधार से अग्रभाग की दूरी (भूमि): १६ हाथ
  • अग्र बिन्दु: अग्र=अ