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सर्वकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

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पृष्ठ 269

छेद्यकाधिकारः १६७
चकारात्तिर्यग्रेखैकदेशासन्नप्रतिवृत्तभागगतस्थग्रहयोः प्रतिवृत्तेऽन्तरमल्पं परिध्येकदेशरूपं
कोटिस्तद्धनुरित्यर्थः । ननूक्तभुजकोटिज्ययोस्तत्संज्ञा कुतः । व्यत्ययेनापि संज्ञायाः समुचित-
त्वादत आह—सेति । तिर्यक्स्थरेखाग्रहान्तरालरूपाऽर्धज्या । ऊर्ध्वाधरा तुङ्गरेखावदित्यर्थः ।
बाहुगुणः । उक्तरूपा भुजज्या । तिर्यग् वृत्तमध्यस्थतिर्यग्रेखावदित्यर्थः । तथा च—
इष्टाद् बाहोर्यत्स्यात्तत्स्पर्शिन्यां दिशीतरो बाहुः ।
त्र्यस्रे चतुरस्रे वा सा कोटिः कीर्तिता तज्ज्ञैः ।
इतिपाठ्युक्तपरिभाषानुरोधेन सर्वेषामूर्ध्वाधररेखायां कोटित्वाभ्युपगमात्तदग्रस-
क्ताग्रतिर्यग्रेखायां भुजत्वाभ्युपगमाच्च तत्संज्ञा सम्यगुक्तेति भावः । तुकारात्कोटिभुजाग्रस-
क्ततिर्यग्रेखायां कर्णत्वाङ्गीकारात्प्रकृते त्रिज्यायाः कर्णत्वमव्याहतमत एव पूर्वमिष्टा त्रिज्या
सा श्रुतिरित्याद्युक्तं सम्यगित्यर्थः ॥१४॥
केदारदत्तः—भूकेन्द्र से ग्रह केन्द्र पृथक है इसकी पृथकता क्षेत्र रचना से बताई जा
रही है—
पूर्वापराभूमि के उत्तर तरफ में नियत बिन्दु से इष्ट त्रिज्या तुल्य व्यासार्ध से कक्षावृत्त
नामक वृत्त की रचना करनी चाहिए । जिस ग्रह का छेदक बनाया जा रहा है उस ग्रह
के मध्यमगति के १५वें अंशात्मक उक्त केन्द्र से जो वृत्त किया जाता है उसे भू (पृथ्वी)
माना गया है । (सूर्य ग्रहण में लम्बन और नति साधन के लिये भी) और अन्यत्र सर्वत्र
उक्त भूकेन्द्र (बिन्दु रूप) ही पृथ्वी और उसका केन्द्र होता है ।
उक्त कक्षावृत्त में १२ राशियां, ३६०° = २१६०० कला आदि संकेत करने चाहिए ।
इष्ट स्थान पर मेषादि बिन्दु मानकर वहां से मीनान्त बिन्दु तक वृत्त में १२ राशियां
अंकित करनी चाहिए ।
मध्यमाधिकार में इष्ट दिन संबंधी अहर्गण से साधित मध्यम ग्रहों में अभीष्ट ग्रह की
मेषादि राशि के आधार से जिस राशि अंश कलादि में अभीष्ट ग्रह हो उस बिंदु पर
ग्रह = ग्र तथा उस ग्रह की गणितागत जो उच्चराशि है उस जगह उच्च के लिये उ बिंदु
लिखना चाहिए ।
भूगर्भ बिंदु से उच्च बिंदु तक की रेखा का नाम उच्च एवं ग्रहगत रेखा का नाम
ग्रहगर्भीय से ग्रह गर्भ कर्ण कहा जाता है ।
भूमध्य से उच्च तक गई रेखा पर लम्ब रूप रेखा (मत्स्य करना = लम्ब रूपा
अन्य रेखा) करनी चाहिए ।
भूगर्भ से ग्रह की परमफलज्या = अन्त्यफल ज्यामित शलाका का दान उच्च रेखा में
देते हुये भूव्यासार्ध में भू केन्द्र में जहांतक अन्त्यफलज्या है उस बिन्दु को ग्रह प्रतिमण्डल
वृत्त का केन्द्र मानकर इस स्थान से त्रिज्यातुल्य व्यासार्ध की दूरी से क्रियमाण वृत्त की
ग्रहभ्रमण कक्षा या प्रतिवृत्त संज्ञा होती है ।