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सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

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( १७ )
०, भाजक = ० लब्धि = ० तथा भाजक = १, भाज्य = ० तो लब्धि = ३ इसी प्रकार
(०)² = ० तथा शून्य का मूल = शून्य । यदि अ क तो अ² = क² तथा अ² - क²
= ० = (अ + क) (अ - क) चूंकि अ - क = ० अतः ०/० = अ² - क² / अ - क = अ + क अथवा
अ² - क² / अ² - क² = १ यहाँ इस प्रकार से ऐसा मान भी अनन्त की तरह हो जाता है । इस प्रकार
के मान से अनन्तत्व का भास होने लगता है । यदि - अ ± १ करते हैं तो योग = ०
अर्थात् यह संख्या ० से भी कम है तथा अ² ÷ ० = लब्धि = अनन्त । यदि शून्य से कम

  • अ से भाग देंगे तो लब्धि = अनन्त से भी अधिक होती है । अतः अ² / - अ = - अ,
    यह संख्या अनन्त से भी अधिक हो जाती है । "गुरूणां गुरु म० म० सुधाकर द्विवेदी ने
    इस सम्बन्ध में लिखा है—
    "अत्यल्पमानमुपलभ्य सकृत्प्रकृत्या
    मानं महाधिकमनन्तमितैर्यदेति ।
    मूलञ्च नो मिलति यस्य रसातलेऽपि
    तस्मै नमोऽच्युतकलामहितेऽधनाय ॥"
    प्रकृतितः अत्यन्त अल्पमान प्राप्ति के साथ जिसका मान महान् से महान् अत्यधिक
    अनन्त तक हो जाता है और, जिस - ० का मूल लाने का कोई भी सिद्धान्त कहीं
    रसातल में भी नहीं है, ऐसे सदास्थायी, शाश्वत अधन (ऋण) शून्य या शेषस्थायी श्री
    विष्णु को नमस्कार है । इत्यादि तक कह दिया है ।
    वर्ग और वर्गमूल प्रसिद्ध होते हुए भी अ ४ - ६ का वर्ग क्या है तो उत्तर =
    १६ अ² - ४८ अ + ३६ अ², १६ अ² - ४८ अ + ३६ अ² का मूल = ४ अ - ६ ।
    जिन संख्याओं का पूर्णतया वर्गमूल नहीं मिलता है उन अवर्गाङ्कों का नाम करणी = क
    संकेत से जाना गया है अतः इस स्थल पर आधुनिक चिह्न करणी अवर्गाङ्क = √ है । अङ्कों
    का योग अन्तर, गुणन, भजन, वर्ग ओर वर्गमूल ६ प्रकार की गणित क्रिया में २ और ८
    अङ्कों के मूलों का योगान्तर क्या है तो उसकी ऐसी गणित क्रिया कही जा रही है जैसे—
    √२ + √८ को करणी को मूल चिह्न की जगह "क" रखने से क २ + क ८ का मान
    ज्ञात करना है इसके लिए भास्कराचार्य और पूर्ववर्ती ब्रह्म गुप्तो ने सिद्धान्त (आविष्कार)
    रचना की है कि, करणियों का साधारण अङ्कों की तरह योग का नाम = महती और
    करणी संख्या x करणी संख्या (योगान्तर ज्ञान के लिये द्वित्रि''''करणी'''से प्राप्त अङ्क) का
    मूल द्विगुणित = लघु मान कर साधारण अङ्क की तरह महती ± लघु = करणियों का
    योगान्तर हो जाता है । उक्त उदाहरण में (क.२ क.८) का योग = १० = महती दोनों के
    २