सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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से उज्जियिनी का पूर्वापर वृत्त, यमकोटि के याम्योत्तर वृत्त पर लम्ब रूप नहीं होने से
यमकोटि के पश्चिम में उज्जयिनी की स्थिति कभी भी नहीं कही जावेगी क्योंकि उज्जयिनी
और यमकोटि के अक्षांशों में एकता नहीं है जो गोल दर्शन से स्पष्ट है ।
वस्तुतः लङ्का द्वीप का अन्तिम भूभाग का अक्षांश लगभग ४।२०' के तुल्य आधुनिक
भूगोल की स्थिति से है । संभव है वर्त्तमान दृश्य लङ्का द्वीप का अधोभाग समुद्र गत हो
गया हो, जिसकी तत्कालीन राजधानी लङ्का नामक नगर में रही होगी ?
तथा उक्त प्रकार के लङ्का खमध्य से ९० अंश की दूरी पर PAPUA, NEW
GUINEA से १६° आगे एक द्वीप है जिसकी राजधानी के नगर का नाम प्राक्काल में
यमकोटि रहा होगा ।
इस प्रकार रेखा देशीय जिस बिन्दु से यमकोटि नगर पूर्व में होता है, तो रेखादेशीय
वह नगर यमकोटि से पश्चिम में नहीं कहा जावेगा । साक्ष्य देशों में प्राची और प्रतीची
(पूर्व पश्चिम) दिग्ज्ञान में पूर्वापर नगरियों की स्थिति अति विचित्र ही होती है ।
[चित्र के विवरण:]
ध्रुव = ध्रु
NOVAYA = न
ओभक = ओ
तास्कन्द = ता
कुरुक्षेत्र = कु
उज्जैन = उ
लङ्का = ल
यमकोटि = य
लङ्का का याम्योत्तर वृत्त ल उ कु ध्रु, लङ्का के पूर्वापर वृत्त ल य पर लम्ब वृत्त है
अत एव, ल बिन्दु से ठीक पूर्व में य बिन्दु है और य बिन्दु के पश्चिम में ल बिन्दु भी
ठीक है ।
किन्तु उ बिन्दु के पूर्व दिशा में य बिन्दु तो है किन्तु य बिन्दु के ठीक पश्चिम में उ
बिन्दु नहीं है । क्योंकि ध्रु य रेखा ही ल य रेखा पर लम्ब रूप ९०° का कोण बना
रही है क्योंकि उ य रेखा से ल य रेखा पर ९०° का कोण नहीं बन रहा है, रेखागणित
से स्पष्ट है ॥४६-४७॥