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सर्वकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

पृष्ठ 178, कुल 723 में से

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पृष्ठ 178

·७६ गोलाध्याये
गंगा का अरुण सरोवर से मिलन होते हुये पूर्व में भद्राश्व वर्ष को गंगा ने पवित्र
किया है इसी भद्राश्व मार्ग से पर्वतों का भेदन करती हुई लवण समुद्र में गंगा का मिलन
हुआ है। मेरु के दक्षिण भागगत प्रवाहात्मक गंगा मानसरोवर होती हुई अलकनन्दा
नाम से प्रसिद्ध हुई, भारतवर्ष में अवतरित हुई है और मेरु के दक्षिण भाग के इलावृत्त
प्रदेशीय हरिवर्ष और किन्नर वर्षीय देशों में भी गंगा का पवित्र प्रवाह हुआ है।
मेरु के पश्चिम भागस्थ प्रवाह महाह्रद प्रदेशसंलग्न चक्षु, केतुमाल और इलावृत्त
के पश्चिम भाग में प्रवाहित होती हुई समुद्रगामिनी हुई है।
उत्तर प्रवाह से श्वेतजल युक्त भद्राश्व अर्थात् मेरु से उत्तर में कुरु देश गत होकर
गंगा समुद्रगामिनी हुई है।
श्री गंगा नाम के स्मरण, गंगास्नान की मात्र इच्छा, श्री गंगा दर्शन, शरीर के
किसी अंग से गंगा का स्पर्श श्री गंगा में समग्र शरीर से आलोडन, (स्नानादि) गंगा
जल पान "गंगांगेति" नाम का उच्चारण श्री गंगा का ध्यान और अनेक प्रकार से श्री
गंगा की स्तुति करने से महापातकी जनसमाज भी पापों से निवृत्त होकर उत्तम गति
को प्राप्त कर लेते हैं।
और आचार्य की उत्कट गंगा भक्ति भी श्री गंगा की विशेष महिमा वर्णन से स्पष्ट
व्यक्त होती है कि—"उस व्यक्ति के सपत्नीक गंगा यात्रार्थ जा रहा हूँ" ऐसे सद्
विचार मात्र की उत्पत्ति से पितृपितामहप्रपितामहादि पितर यदि यमदूतों से बद्ध हैं तो
वे भी यम बन्धन से मुक्त हो जाते हैं।
यदि गंगातीर्थ यात्रा प्रारम्भ की जाती है तो उस यात्री का पूर्वोक्त पितृ लोक गत
पितृ समाज प्रसन्न हो जाता है कि हमारे दुष्कृत कर्मों का क्षय हो गया है।
गंगातट की प्राप्ति, गंगा स्नान, द्रव्य दान और देवऋषिपितृ तर्पण करने से उसके
पितरों को नरक में ले जाने के लिये आये हुये यम दूतों से वह जीव मुक्त होकर उसके
पितरों को देव दूत सुखेन स्वर्ग गामी करते हैं ॥३७॥३८॥३९॥४०॥
इदानीं भारतस्यापि मध्ये नव खण्डानि सप्त कुलाचलांश्चाऽऽह—
ऐन्द्रं कशेरुशकलं किल ताम्रपर्ण-
मन्यद्गभस्तिमदतश्च कुमारिकाख्यम् ।
नागं च सौम्यमिह वारुणमन्त्यखण्डं
गान्धर्वसंज्ञमिति भारतवर्षमध्ये ॥४१॥