सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८ गोलाध्याये
जठरमुदरम् । मध्यगर्भकेन्द्रमिति यावत् । अत्र गता स्थिता । केन्द्रैक्येण रूपेण । या
मही पृथिवी । तस्या यत्पृष्ठम् । सर्वेषामाधारभूतम् । तत्र निष्ठा स्थितिर्यस्येत्येतादृशो
'विरञ्चिरित्यर्थः । तथा च विश्वस्य निर्माणार्थं परमेश्वरेण स्वांशभूतो ब्रह्मोपकल्पित-
स्तच्छरीरजनकप्रकृतिपरिणामरूपं ब्रह्माण्डमेव । प्राकृतेऽण्डे विवृद्धे तु क्षेत्रज्ञो ब्रह्मसंज्ञितः ।
'हिरण्यगर्भो भगवान्ब्रह्मा वै कनकाण्डज इति पुराणोक्तेर्विरञ्चिनिर्मितविश्वस्य पृथिव्यामेव
संनिवेशात्तस्याश्च ब्रह्माण्डोदरे संनिवेशादिति पुराणादौ प्रसिद्धतरमतो नाप्रमाणमिति
भावः ॥१॥
केदारदत्तः—ग्रहगोल का गणित और ग्रहों की गति आदिक से ग्रहों का आकाशीय
स्थान वर्णन करना ही ग्रन्थ का मुख्य विषय है । पृथ्वी आदिक तत्त्वों का एक बीज स्वरूप
पर ब्रह्म को प्रणाम पूर्वक ब्रह्म की स्तुति की जा रही है ।
यहाँ पर इस श्लोक में आचार्य ने सांख्य वेदान्तादि शास्त्रों का निष्कर्ष ही कह दिया
है कि प्रकृति पुरुष की क्षुब्धता से बुद्धि तत्त्व की समुत्पत्ति होती है । महत्तत्त्व के गर्भ में
गुण वश तीन प्रकार का सात्विक राजस और तामस रूप अहंकार है । उस अहंकार से
आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी अपने अपने गुणपूर्वक उत्पन्न होते हैं । इस प्रकार
इनसे उत्पन्न अनेक तत्त्वों का प्राकृतिक प्रलय सकल जलमय जल में बुद्बुदाकार ब्रह्माण्ड
की समुत्पत्ति होती है । ब्रह्माण्ड के गर्भ में कमल आकार की पृथ्वी संस्थित होती है ।
पृथ्वी में कर्णिकाकार मेरु पर्वत है । उसके पृष्ठ में ब्रह्मा रहते हैं । उस ब्रह्म
से मनुष्य राक्षस आदिक विश्व का निर्माण होता है इस श्लोक का अति विस्तार यहाँ पर
आवश्यक नहीं है । क्योंकि यह विषय ज्योतिष शास्त्र से सम्बन्धित होते हुए भी
शास्त्रान्तर का विषय है जो सुविशद विवर्णित है ॥१॥
इदानीं भूमेः स्वरूपमाह—
भूमेः पिण्डः शशाङ्कज्ञकविरविकुजेज्यार्किनक्षत्रकक्षा-
वृत्तैर्वृत्तो वृतः सन् मृदनिलसलिलव्योमतेजोमयोऽयम् ।
नान्याधारः स्वशक्त्यैव वियति नियतं तिष्ठतीहास्य पृष्ठे
निष्ठं विश्वं च शश्वत्सदनुजमनुजादित्यदैत्यं समन्तात् ॥२॥
सर्वतः पर्वतारामग्रामचैत्यचयैश्चितः ।
कदम्बकुसुमग्रन्थिः केसरप्रसरैरिव ॥३॥
वा० भा०—योयं मृदनिलसलिलव्योमतेजोमय इति पाञ्चभौमिको भूमेः
पिण्डो वृत्तो वर्तुलाकारस्तद्बहिःस्थैः शशाङ्कादिकक्षावृत्तैरावृतः सन्नन्याधारः
स्वशक्त्यैव नियतं निश्चितं वियत्याकाशे तिष्ठति । तत्पृष्ठनिष्ठं च जगत् । सद-