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सर्वकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

पृष्ठ 102, कुल 723 में से

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( ९५ )
इस प्रकार गुरु शिष्य की यह शाश्वत की एकत्व की चिरस्थायिनी यह भावना
“महेश” शब्द में ही निहित है—
“मनोदोषादि दूरत्वाद्धेतुवादादि वर्जनात् ।
श्वादिप्राणिषु सादृश्यात् रम्यत्वाच्च महेश्वरः ॥”
इस प्रकार जीवमात्र की एकत्व रूप ज्ञान की यह सद्भावना इसी श्री काशी क्षेत्र में
जीव मात्र को प्राप्त होकर जीवन्मुक्ति इसी काशी क्षेत्र हुई है और होती रहती हैं और
होती भी रहेगी । अत एव यह काशी नगरी धन्य है । इस श्री काशी नगरी में यह
लेखनी सार्थक हो रही है और सार्थकता का एकमात्र उपाय यही है कि—
“स्नातव्यं जाह्नवीतोये द्रष्टव्यः पार्वतीपतिः ।
स्मर्तव्यः कमलाकान्तो वस्तव्यं काशिकास्थले” ॥
एवं—
पेयं पेयं श्रवणपुटकैः रामनामाभिरामम् ।
ध्येयं ध्येयं मनसि सततं तारकं ब्रह्मरूपम् ॥
जल्पन् जल्पन् प्रकृति विकृतौ प्राणिनां कर्णमूले ।
वीथ्यां वीथ्यामटति जटिलः कोऽपि काशी निवासी ॥
यहाँ पर “कोऽपि” शब्द की व्याख्या असीमित है । मन, वाणी, बुद्धि से इस शब्द
का व्याख्यान असम्भव है । ऐसे अनिर्वचनीय मात्र महान तत्व को “शिव शिवेति शिवेति
च” से उच्चारित किया जाता है । धन्य है ऐसा ‘अनिर्वचनीय’, ‘समदर्शी’, ‘अघोर’,
‘कीनाराम’, ‘शिव’ तत्व ।
उक्त आशय को प्रतिक्षण स्मरण करते हुए शेष जीवन की सार्थकता का एकमात्र
भरोसा अघोर रूप बाबा विश्वनाथ को समझ कर यह लेखनी और यह लेखक दोनों
विश्राम की कामना कर रहे हैं ।
इति-शम्
हरि-हर्ष निकेतन केदारदत्त जोशी
१/२८, नगवा (नलगाँव) ज्योतिषशास्त्राचार्य
श्रीकाशी, वाराणसी उ० प्र० ( गणित + फलित )
संवत् २०४५ गुरुवार अवकाश प्राप्त प्राध्यापक
अधिक ज्येष्ठ कृष्ण द्वितीया काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
ता० २-६-१९८८ वाराणसी