सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
पृष्ठ 122, कुल 609 में से
संदर्भ में पढ़ेंग्रहानयन वर्णनम् २५
प्लवङ्गः (४१) कीलकः (४२) सौम्यः (४३)
साधारणो (४४) विरोधकृत् (४५)
चान्द्रे युगे च नवमे त्रि चतुर्थौ शुभप्रदौ । ४१ ।
चान्द्र नामक ९ वें बृहस्पति युग के सम्वत्सर है-४१ प्लवङ्ग ४२. कीलक,
४३, सौम्य, ४४. साधारण, ४५. विरोधकृत् । इसमें तीसरे और चौथे शुभ हैं ।
परिधानी (४६) प्रमाथी (४७) च आनन्दो (४८)
राक्षसो (४९) ऽनलः (५०)
ऐन्द्रानल युगे ऽन्त्यौ च दशमे दुः खदायकौ । ४२ ।
ऐन्द्रानल नमक दशवें वृहस्पति युग के सम्वत्सर हैं - ४६. परिधावी ४७.
प्रमाथी, ४८. आनन्द, ४९. राक्षस, ५०, अनल । इसमें अन्तिम दोनों दुःखदायक
हैं ।
कपिलः (५१) काल (५२) सिद्धार्थी (५३)
ततो रौद्रौ (५४) ऽ थदुर्मतिः । (५५)
एकादशाश्विन युगे मध्य एव शुभप्रदः । ४३ ।
आश्विन नामक ११ वें युग के वर्ष हैं-५१. कपिल, ५२. काल, ५३ . सिद्धार्थ,
५४. रौद्र, ५५. दुर्मति । इसमें सिर्फ सिद्धार्थ शुभ हैं ।
दुन्दुभि (५६) रुधिरोद्गारी (५७) रक्ताक्ष (५८) क्रोधनः ( ५९) क्षयः (६०)
कष्टात्कष्टप्रदाः सर्वे भाग्ये द्वादश के युगे । ४४ ।
भाग्य नामक १२ वें युग के वर्ष हैं-५६. दुन्दुभि, ५७ रुधिरोद् गारी, ५८.
रक्ताक्ष, ५९, क्रोधन, ६० क्षय । इसके सभी वर्ष महाकष्टप्रद हैं ।
विष्णु (१) वृहस्पतिः (२) शक्रो (३) वह्नि (४) त्वष्टा (५) ततः
परम् अहिर्बुध्न्य (६) श्च पितरो (७) विश्वेदेव (८) निशापतिः (९) । ४५ ।
१. विष्णु, २. वृहस्पति, ३. शक्र, ४. वह्नि, ५. त्वष्टा, ६ अहिर्बुध्न्य ७. पितर,
८. विश्वदेव, ९. निशापति ।
-इन्द्राग्नी (१०) चा श्विनीपुत्रौ (११) भग (१२)
श्चेतियुगाधिपाः स्वकाला चार सिद्धेज्य वत्सरा लिखिता अनु । ४६ ।
१०. इन्द्र और अग्नि, ११. अश्विनी कुमार और १२ भग-ये ऊपर लिखे १२
बार्हस्पत्य युगों के अधिपति हैं ।
युगे युगांघ्रौ पूर्णत्वाद र्कैन्दु भगणा वलेः ।
युगतत्पाद दिवसैस्तत्साधन मधीष्यते । ४७ ।
महायुग और पादयुग (सत्य, त्रेता, द्वापर, कलि) में सूर्य और चन्द्र अपने
पूर्णा भगण पूरा करते हैं । अतः इनका मध्यमान युग अहंगण या पाद युग अहर्गण