सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

पृष्ठ 90, कुल 222 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 90

यह पवित्रतम चैतन्य का प्रतीक है, यहाँ शिव-शक्ति का ऐक्य होता है । प्रबुद्ध
कुण्डलिनी इस सहस्रार में परम शिव से अभिन्न हो जाती है । शिवसंहिता में
भगवान् शिव का कथन है कि सहस्रार में योनिमण्डल है, इसी के नीचे चन्द्रमा
का स्थिति है । योगी इस चन्द्रमण्डल का ध्यान कर संसार में पूज्य हो जाता
है । वह देवता और सिद्धों के समान ऐश्वर्य शाली हो जाता है । यह सहस्रार
पद्म दिव्य रूप वाला है, यह ब्रह्माण्डरूपी देह के बाहर विद्यमान रहता है ओर
मोक्ष देता है ।
अत ऊर्ध्वं दिव्यरूपं सहस्रारं सरोरुहम् ।
(शिवसंहिता ५.१८६।
यद्यपि गोरखनाथजी ने आकाश चक्र को ही कैलास कहा है तथापि सहस्रार
ही कैलासरूप में प्रसिद्ध है । इस सहस्रदल पद्म का ज्ञान प्राप्त होने पर चित्तवृत्ति
लय को प्राप्त हो जाती है, इसके फलस्वरूप अखण्डज्ञानस्वरूप निरंजन का
साक्षात्कार होता है ।
यज्ज्ञात्वा प्राप्तविषय चित्तवृत्तिर्विलीयते ।
तस्मिन् परिश्रमं योगी करोति निरपेक्षतः ।
चित्तवृत्तिर्यदा लीना तस्मिन् योगी भवेद्ध्रुवम् ।
तदा विज्ञायतेऽखण्डज्ञानरूपी निरञ्जनः ॥
( शिवसंहिता ५ । १६४-६५ )
यह सहस्रार पद्म शिखरलोक, अमरलोक, भँवरगुफा आदि नामों से भी
प्रसिद्ध है । नाभिकमल से उठे श्वास का यह विश्राम-स्थान है । महाकुण्डलिनी
आधार पद्म से जागरित होती हुई इसी सहस्रार में प्रवेश कर शिवरूपिणी हो
जाती है । यह शरीररूपी वृक्ष का मूल है, यह अमृत का ऊर्ध्वमुख कूप है,
इसे औंधा कूप भी कहा जाता है । इस स्थान पर वृत्ति-सुरति का स्थिर हो
जाना ही निर्विकल्प या सहज समाधि है ।
गगन मंडल में ऊँधा कूबा तहां अमृत का वासा ।
( गोरखबानी सबदी २३ )
आकाश चक्र ही महायोगी गोरखनाथ की योगदृष्टि में नौवाँ चक्र है ।
भगवान् शिव का कथन है कि सहस्रार ही कैलास है और परमेश्वर, क्षयवृद्धिवि-
वर्जित अकुल, अविनाशी शिव का ही यहाँ निवास है ।
४८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति