सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसदृश धूम की शिखा के आकार वाला है, इसका योगी को ध्यान करना चाहिये ।
यहीं मुक्ति की प्राप्ति कराने वाला जालन्धर पीठ है । ( धूम सदृश तेज का इस
चक्र में ध्यान करने से समस्त प्रपञ्चजाल का नाश करने वाला-उन्मूलन करने
वाला परमात्मा-जालन्धर अभिव्यक्त होता है । सहस्रार के मूल में सूई की नोंक
के समान एक धूमशिखाकार छिद्र है, यही ब्रह्मरन्ध्र-निर्वाणचक्र है । ) इस चक्र
में जालन्धर पीठ मोक्षप्रद होता है ॥ ८ ॥
विशेष ब्रह्मरन्ध्र चक्र-निर्वाण चक्र सहस्रार के मूल में स्थित है, इसका
ध्यान कर साधक नासा के अग्रभाग पर दृष्टि स्थिर कर अपने आत्मस्वरूप - शिव
स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जा जाता है ।
ब्रह्मरन्ध्र महाचक्रे सहस्रारे च पङ्कजे ।
नासाग्रदृष्टिरात्मानं ध्यात्वा सिद्धो भवत्स्वयम् ॥
( विवेकमार्तण्ड १७५ )
सिद्ध होने का आशय है परमात्मस्वरूप की प्राप्ति । यदि योगी ब्रह्मरन्ध्र
( निर्वाण चक्र ) में मन लगाकर आधे क्षण तक भी स्थिर रहता है, तो वह
समस्त पापों से मुक्त होकर परम गति को प्राप्त हो जायेगा । इस ब्रह्मरन्ध्र में
लीन मन वाला योगी अणिमादि सिद्धियों से प्राप्त सुख-सुविधा का उपभोग
करता हुआ शिवस्वरूप हो जाता है। वह परमेश्वर शिव को प्रिय हो जाता है
और अनेक मुमुक्षुओं को उपदेश देकर संसार-सागर से पार उतार देता है ।
ब्रह्मरन्ध्रे मनो दत्त्वा क्षणार्धं यदि तिष्ठति ।
सर्वपापविनिर्मुक्तः स याति परमां गतिम् ॥
अस्मिन् लीनं मनो यस्य स योगी मयि लीयते ।
अणिमादिगुणान् भुक्त्वा स्वेच्छया पुरुषोत्तमः ॥
एतद्रन्ध्रध्यानमात्रेण मर्त्यः
संसारेऽस्मिन् वल्लभो मे भवेत्सः ।
पापान् जित्वा मुक्तिमार्गाधिकारी
ज्ञानं दत्वा तारयत्यद्भुतं वै ॥
( शिवसंहिता ५ । १७३-७५ )
निर्वाणचक्र व्यष्टि चेतना द्वारा अनन्त शाश्वत ब्रह्म की सिद्धि का श्रेष्ठतम
केन्द्र है । व्यष्टि चेतना इस स्तर पर सच्चिदानन्दस्वरूप में तल्लीन हो जाती है ।
४६ ] । सिद्धसिद्धान्तपद्धति