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सर्वकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

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पृष्ठ 206

नीत्वा मध्यमसन्धिसंघटघटात् प्राप्तां शिरोदेशतः
पीत्वा षड्विधपानकाष्ठभजनं वाञ्छन्ति ये मोहिताः । ८१ ।
( महायोगी गोरखनाथ का कथन है कि खेचरी मुद्रा की भी सिद्धि क्यों
न हो जाय, पर निरुत्थान के बिना यह भी निष्फल है । ) जो अच्छी तरह चालन-
दोहन-क्रिया के द्वारा जीभ को दीर्घ कर तालु के अन्त में दशम द्वार—भ्रूमध्य में
ले जाकर ( ! उसमें उसे—जिह्वा को संयुक्त कर ) सहस्रार से द्रवित अमृत का
षड्रसरूप पान करते हैं और खेचरी मुद्रा की सिद्धि कर लेते हैं, वे भी यदि
निरुत्थान--परमपद की प्राप्ति की इच्छा करते हैं, तो भ्रमित हैं । उन्हें भी
निरुत्थान नहीं प्राप्त हो सकता ।। ८१ ।।
गुह्यात्पश्चिमपूर्वमार्गमुभयं रुध्वानिलं मध्यमं
नीत्वा ध्यानसमाधिलक्ष्यकरणैर्नानासमाध्यासनैः ।
प्राणापानगमागमेन सततं हंसोदरे संघटा
एवं येऽपि भजन्ति ते भवजले मज्जन्त्यहो दुःखिताः । ८२ ।
गुदास्थान—मूलाधार से पश्चिम-पूर्व-पथ में इडा और पिंगला नाड़ियों में
प्रवाहित प्राण को रोक कर सुषुम्ना में प्रविष्ट प्राणवायु को ऊर्ध्व कर ध्यान-
समाधि आदि विभिन्न साधनों से प्राण-अपान के गमनागमन पर दृष्टि स्थिर कर
जो नाड़ी-समूहों में ही ध्यान में तत्पर रहते हैं, वे भी समरसकरण के बिना
निरुत्थानरूप परमपद की प्राप्ति न करने से दुःखी रहते हैं, संसारसागर में डूबते
रहते हैं ।। ८२ ।।
शक्त्याकुञ्चनमग्निदोप्तिकरणं त्वाधारसंपीडनात्
स्थामात्कुण्डलिनीप्रबोधनमतः कृत्वा ततो मूर्धनि ।
नोत्वा पूर्णगिरिं निपातनमधः कुर्वन्ति तस्याश्च ये
खण्डज्ञानरतास्तु ते निजपदं तेषां हि दूरं मतम् । ८३ ।
जो शक्तिचालनी मुद्रा के अभ्यास द्वारा एड़ी से मूलाधार को दबाकर
मूलबन्ध सिद्धकर अग्नि प्रदीप्त कर ( तथा अपानवायु का ऊर्ध्वाकर्षण कर )
कुण्डलिनी को प्रबुद्ध कर पूर्णगिरि पीठ में ले जाकर शिवशक्ति के साक्षात्कार में
आनन्दित होते हैं और तत्पश्चात् कुण्डलिनी को ( ध्यान हटाते समय ) मूलाधार
में ही उतार लाते हैं, वे ऐसा करके खण्डज्ञान—अपूर्ण आत्मबोध ही प्राप्त करते हैं,
१६४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति