सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
पृष्ठ 200, कुल 222 में से
संदर्भ में पढ़ेंबाह्य-दोनों प्रकार के पदार्थों से परे सर्वव्यापक-कलंकी, योगमायोपाधिविशिष्ट
साकार-सगुण परमेश्वर-पुरुषोत्तम ही योगियों के लिये शुद्ध-बुद्ध, मायोपाधिरहित
अलख-निरञ्जन परमात्मा है ॥ ५७-६१ ॥
मुक्तिचारे मतिर्या वै व्यापिका स्वप्रकाशिका ।
एषा ज्ञानवती येन ज्ञातासौ सात्त्विको भवेत् । ६२ ।
क्षपणं चित्तवृत्तीनां रागद्वेषविलुण्ठनम् ।
कुरुते व्योमवन्नग्नो योऽसौ क्षपणको भवेत् ।
प्रसरं भासते शक्तिः सङ्कोचं भासते शिवः ।
तयोर्योगस्य कर्ता यः स भवेत्सिद्धयोगिराट् । ६३ ।
मोक्षप्राप्ति के अनुष्ठान में स्वप्रकाशमयी, ज्ञानवती अखण्ड बुद्धि में
जिसकी मति निरन्तर तल्लीन है, वही सात्त्विक कहा जाता है । जो रागद्वेष का
उन्मूलन कर चित्त की वृत्तियों का ( योगानुष्ठान के द्वारा ) निरोध कर लेता
है, वही क्षपणक कहलाता है । वह व्योम के समान नग्न दिगम्बर होता है । शक्ति
सृष्टि का प्रसार प्रकाशित करती है, शिव उसका लय-संहार ( संकोच ) करता
है, शक्ति और शिव में ऐक्य-भाव दृढ़ करने वाला सिद्ध योगिराज कहा जाता है
अथवा शक्ति प्राणवायु है, श्वास-निःश्वास की प्रसारिका है और शिव ( आकर्षण
करने वाला ) अपानवायु है, इन दोनों के मेलन-सामरस्य का कर्ता सिद्ध
योगिराज कहलाता है ॥ ६२-६३ ॥
विश्वातीतं यथा विश्वमेकमेव विराजते ।
संयोगेन सदा यस्तु सिद्धयोगी भवेत्तु सः । ६४ ।
सर्वासां निजवृत्तीनां प्रसृतिर्भजते लयम् ।
स भवेत्सिद्धसिद्धान्ते सिद्धयोगो महाबलः । ६५ ।
उदासीनः सदा शान्त स्वस्योऽन्तर्निजभासकः ।
महानन्दमयो धीरः स भवेत् सिद्धयोगिराट् । ६६ ।
परिपूर्णः प्रसन्नात्मा सर्वासर्वपदोदितः ।
विशुद्धो निर्भरानन्दः स भवेत् सिद्धयोगिराट् । ६७ ।
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