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सर्वकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

पृष्ठ 163, कुल 222 में से

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पृष्ठ 163

परम पद की प्राप्ति में गुरु ही ठीक-ठीक सन्मार्गदर्शन कराने वाला होता
है, सन्मार्ग ही योगमार्ग है ( जिसके द्वारा समस्त चित्तवृत्तियों का निरोध होने
पर सहज समाधि में साधक को परम पद का साक्षात्कार होता है । योगमार्ग
(श्रुतिस्मृतिप्रतिपादित सम्यक् स्वरूपप्राप्ति-मार्ग) के अतिरिक्त दूसरा मार्ग पाखंड
मार्ग है ( जिस पर अनात्मवादी चलकर सन्मार्ग की निन्दा और खण्डन करता
है) । आदिनाथ शिव का कथन है—जो योगमार्ग और उसके उपायभूत (सहायक)
तन्त्र ( दक्षिण मार्ग ) में दीक्षित और गुरुमुख हैं, उनकी निन्दा करने वाले और
उन ( निन्दकों ) के सहायक पाखण्डी हैं, क्योंकि वे सत्स्वरूप की प्राप्ति में
बाधक और अनभिज्ञ हैं ॥ ५ ॥
विशेष—यह योगमार्ग ही सिद्धमार्ग है, कैवल्यपद—परमपद की प्राप्ति
इसों मार्ग के अनुशीलन से सम्भव है ।
नानामार्गैस्तु दुष्प्राप्यं कैवल्यं परमं पदम् ।
सिद्धमार्गेण लभ्यन्ते नान्यथा शिवभाषितम् ॥
( योगबीज-८ )
योग से बड़ा परमपद की प्राप्ति की दिशा में कोई दूसरा बल ही नहीं है ।
यस्मिन् दर्शिते सति तत् क्षणात् स्वसंवेद्यसाक्षात्कारः
समुत्पद्यते ततो गुरुरेवात्र कारणमुच्यते ॥ ६ ॥
जिस समय ( सिद्ध गुरु द्वारा ) परमपद की प्राप्ति के उपायभूत योगमार्ग
के उपदेश से परमात्मबोध कराया जाता है, तत्काल ही ( उसी समय )
स्वसंवेद्य अलख-निरञ्जन परमेश्वर का साक्षात्कार हो जाता है । ( यह निर्वि-
वाद है कि ) परमपद की प्राप्ति में गुरु ( की कृपा ) ही एकमात्र कारण
है ॥ ६ ॥
गुरु और सामरस्य
तस्माद् गुरुकटाक्षपातात् स्वसंवेद्यतया च महासिद्ध-
योगिभिः स्वकीयपिण्डनिरुत्थानानुभवेन समरसं क्रियत इति
सिद्धान्तः ॥ ७ ॥
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १२१