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सर्वकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

पृष्ठ 158, कुल 222 में से

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पृष्ठ 158

( मध्य कुण्डलिनी शक्ति का सहस्रार में प्रवेश ही ऊर्ध्व-शक्तिनिपात कहा
जाता है । ) ऊर्ध्वशक्ति-निपात का वर्णन किया जाता है । समस्त विषयप्रपञ्च—
भौतिक पदार्थों के ऊपर वर्तमान रहने की स्थिति ही ऊर्ध्व है । नाम-रूप से
रहित आदिनाथ परमेश्वरस्वरूप ही परमपद है । उस अनन्त अखण्ड परमात्मा
की स्वरूपाभिव्यक्ति करनेवाली शक्ति ही ऊर्ध्व शक्ति ( परम जाग्रत् परमेश्वरी
कुण्डलिनी ) कही जाती है । मूलाधार से मणिपूर चक्रादि का भेदन करती
हुई महाकुण्डलिनी सहस्रार में शिव का ऐक्य प्राप्त कर 'यह, तुम, मैं' आदि के
भेदभाव का अन्त कर देती है, किंतु ( साथ-ही-साथ ) परमात्मा और जीवात्मा
के अखण्ड-अभिन्न व्यापक स्वरूप का ज्ञान करा देती है ॥ २५ ॥
शिवस्याभ्यन्तरे शक्ति शक्तेराभ्यन्तरः शिवः ।
अन्तरं नैव जानीयाच्चन्द्रचन्द्रिकयोरिव ॥ २६ ॥
( शक्ति और शक्तिमान्—स्वरूपतः दोनों एक-दूसरे में अभिन्न हैं । कूटस्थ
असंग शिव सर्वत्र व्यापक हैं, शिव को धारण करनेवाली शक्ति भी व्यापक है । )
शिव में शक्ति है, शक्ति में शिव हैं, जिस तरह चन्द्रमा और चाँदनी में स्वरूपतः
भेद—भिन्नता नहीं है, उसी तरह शिव और शक्ति में भिन्नता नहीं है । ' दोनों
में कूटस्थता और असंगता की दृष्टि से व्यवहार में भेद परिलक्षित होता है और
पारमार्थिक सत्ता में वे स्वरूपतः अखण्ड और अभेद हैं । ) शिव-शक्ति
एक हैं ॥ २६ ॥
अत ऊर्ध्वशक्तिनिपातेन योगिभिः परमं पदं प्राप्यत इति
सिद्धम् ॥ २७ ॥
अतएव योगियों द्वारा ऊर्ध्व शक्ति—भगवती कुण्डलिनी महाशक्ति के निपात
से सहस्रार में पूर्ण जाग्रत् कर प्रविष्ट कराने पर परम पद की—स्वरूप-स्थिति
की प्राप्ति की जाती है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है ।
सत्त्वे सत्त्वे सकलरचना राजते संविदेका
तत्त्वे तत्त्वे परममहिमा संविदेवावभाति ।
भावे भावे बहुलतरला लम्पटा संविदेषा
भासे भासे भजनचतुरा बृंहिता संविदेव ॥२८॥
११६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति