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सर्वकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

पृष्ठ 155, कुल 222 में से

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पृष्ठ 155

विशेष --साधक योनिस्थान --गुदा और मेढ्र के मध्य भाग के स्थान
को किसी भी पैर की एड़ी से दवा कर गुदा को सिकोड़े और फैलाये तथा
अपान वायु को ऊपर की ओर खींचे । यही मूलवन्ध है । जिससे नीचे की
ओर गतिशील अपानवायु को साधक सुपुम्ना में प्रवाहित करता है अथवा
ऊपर की ओर उठाता है, वही मूलवन्ध है । जिस बन्ध से प्राण उड़कर
सुपुम्ना नाड़ी में पहुँच जाता है, वही उड्डियानवन्ध है । नाभि के ऊपर
और नीचे उदर में पीछे की ओर इस तरह आकर्षण करे कि दोनों भाग
पीठ तक—पीछे पहुँच जाय । कम-से कम इस तरह तीन वार आकर्षण करना
चाहिये । कंठ ( गले के विवर ) को सिकोड़ कर साधक को हृदय-देश में--
वक्ष के समीप चार अंगुल की दूरी पर ठोड़ी को दृढ़ता से स्थापित करना
चाहिये । यही जालन्धरवन्ध है । इन तीनों वन्धों के अभ्यास से कुण्डलिनी
महाशक्ति क्रमशः सहस्रार में पहुँच जाती है ।
यस्माच्चराचरं जगदिदं चिदचिदात्मकं प्रभवति तदेव
मूलाधारं संवित्प्रसरं प्रसिद्धम् ॥ १६ ॥
जिससे चर-अचर, स्थावर-जंगम, चिद्, अचिद् समस्त जगत् की उत्पत्ति
होती है, वह मूलाधार है, जिसके संकोच और प्रसरण से कुण्डलिनी का प्रबोधन
होने पर ज्ञान की वृद्धि होती है—यह मूलाधार ही संवित्प्रसारण-भूमि है ॥ १९ ॥
सर्वशक्तिप्रसरसंकोचाभ्यां जगत्सृष्टिः संहृतिश्चभवत्येव न
सन्देहस्तस्मात्सा मूलमित्युच्यते । अतः प्रायेण सर्वे सिद्धा
मूलाधाररता भवन्ति ॥ २० ॥
समष्टिरूप ( सर्वेश्वरी ) महाशक्ति के व्यापार—कार्य से ही ( संकोच
और प्रसरण से ही ) जगत् का सृजन और संहार होता है, इसमें संदेह नहीं
है ( कि योगी इस मूल शक्ति का ध्यान कर जगत् की सृष्टि और संहार कर
सकता है ) । यही कारण है कि मूलाधार में स्थित यह महेश्वरी शक्ति ही
मूल शक्ति है । प्रायः सभी सिद्ध, यही कारण है कि मूलोधारशक्ति—कुण्डलिनी
को जगाने में तत्पर रहते हैं ॥ २० ॥
तरङ्गितस्वभावं जीवात्मानं वृथाभ्रमन्तमपि स्वप्रकाश
मध्ये स्वस्वरूपतया सदा धारयितुं समर्था या सा कुण्डलिनी
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] - [ ११३