सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअकुलमिति जातिवर्णगोत्राद्यखिलनिमित्तत्वेनै कमैवास्तीति-
प्रसिद्धं तथा चोक्तमुमामहेश्वरसम्वादेनिरुत्तरेऽनन्यत्वादखण्डत्वा-
दद्वयत्वादनन्यत्वान्निर्धर्मत्वादनामत्वादकुलस्यनिरुत्तरमिति ॥६॥
अनादि परब्रह्म परमेश्वर आदिनाथ निराकार, निरंजन, स्वसंवेद्य अकुल
शिवमें अभिन्न पराशक्ति अकुल अवस्था में निरन्तर विद्यमान अथवा स्वरूपस्थ रहती
है । इस अकुल अवस्था में जाति, वर्ण, गोत्र आदि अखिल निमित्त (व्यवहार-कारण)
से रहित असंग अकुल शिव में कूटस्थ पराशक्ति ही शेष रहती है—ऐसा उमा-
महेश्वरसम्वाद के रूप में रचित निरुत्तर ग्रन्थ में प्रतिपादित है । समस्त भेदोंसे
परे होने के नाते यह शक्ति अखण्ड, अद्वय, अनन्य, कार्यकारणरहित, नामातीत,
रूपातीत अकुल कही गयी है ॥ ६ ॥
आज्ञावती पराशक्ति
एवं कुलाकुलरूपा सामरस्यप्रकाशभूमिकास्फुटीकरण
एकैवमर्था या साऽपरंपरा शक्तिरेवावशिष्यते अपरंपरं
निखिलविश्वप्रपञ्चजालं परतत्त्वं सम्पादयत्येकीकरोती-
त्यपराशक्तिराज्ञावती प्रसिद्धा ॥ १० ॥
इस तरह कुलाकुलरूप यह पराशक्ति सामरस्यरूप अभेदता- तादात्म्य के
प्रकाश की स्थिति को स्फुटित करने में सर्वधर्मरहित अखण्ड, नित्य, अद्वय, अनन्त
रूप अकुलावस्था से तत्पर रहती है । यही शक्ति अपरंपरा, निजा आदि नाम से
प्रसिद्ध समस्त विश्वप्रपञ्च के आधाररूप से महाप्रलय में अवशिष्ट रहती है ।
यह स्थावर-जंगम सकल विश्वप्रपञ्चजालंको परमेश्वररूप परमतत्त्व में सम्पादित
कर एक कर देती है, यही अपरंपरा नामवाली शक्ति है । यह परमेश्वर
आदिनाथ की आज्ञावती ( आज्ञाकारिणी - स्वरूपप्रकाशिका ) शक्ति कही
जाती है ॥ १० ॥
अकुलंकुलमाधत्ते कुलञ्चाकुलमिच्छति जलबुद्बुद्वन्न्याया-
देकाकारः परः शिवः ॥ ११ ॥
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