सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
पृष्ठ 118, कुल 222 में से
संदर्भ में पढ़ेंपद्मासन में स्थित जो योगी नाड़ी-द्वार से पूरित की गयी वायु स्थिर कर
लेता है—सुषुम्ना में स्थापित कर ऊर्ध्वमुखी कर लेता है, वह मुक्त ( अपने स्वरूप
में स्थित ) हो जाता है ।
स्वरूप में स्थिति की दृढ़ता के लिये सिद्धासन का अभ्यास बहुत
आवश्यक है ।
योनिस्थानकमङ्घ्रिमूलघटितं कृत्वा दृढं विन्यसेन्
मेढ्रेपादमथैकमेव नियतं कृत्वा समं विग्रहम् ।
स्थाणुः संयमितेन्द्रियोऽचलदृशा पश्यन् भ्रुवोरन्तर
मेतन्मोक्षकपाटभेदनकं सिद्धासनं प्रोच्यते ॥
( गोरक्षशतक-११ )
गुदा और मेढ्र के मध्य में योनि, कुण्डलिनी-स्थान है। योगी इस योनि
स्थान को बायें पैर की एड़ी से दबा कर दायें पैर की एड़ी को मेढ्र ( उपस्थ )
पर लगा ले, शरीर को सीधा रखे, सभी इन्द्रियों को वश में रखे, भ्रू के मध्य
में दृष्टि को स्थिर कर बिना हिले-डुले रहे, यही मोक्ष के दरवाजे को खोलनेवाला
सिद्धासन कहा गया है ।
यह आसन सिद्धों को भी सिद्धि प्रदान करनेवाला है । इस सिद्धासन के
अभ्यास से साधक को योगज्ञान प्राप्त हो जाता है । वायु के अभ्यासी के लिये
यह आसन बड़ा उपयोगी है । योगी संसार-सागर से पार होकर मुक्तिपूर्वक परम
गति पाता है । इसके ध्यान मात्र से योगी पाप से छूट जाता है ।
येनाभ्यासवशात् शीघ्रं योगनिष्पत्तिमाप्नुयात् ।
सिद्धासनं सदा सेव्यं पवनाभ्यासिना परम् ॥
ये संसारमुत्सृज्य लभते परमां गतिम् ।
नातः परतरं गुह्यासनं विद्यते भुवि ।
येनानुध्यानमात्रेण योगी पापाद् विमुच्यते ॥
( शिवसंहिता ३ । १०३-१०४ )
सिद्धासन का अभ्यास अत्यन्त शुभकारी और परमोपयोगी है ।
प्राणायाम इति प्राणस्य स्थिरता । रेचकपूरककुम्भक
संघटकरणानि चत्वारि प्राणायामलक्षणानि ॥ ३५ ॥
७६ ] { सिद्धसिद्धान्तपद्धति