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सर्वकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

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पृष्ठ 113

नियमा दशसंप्रोक्ता योगशास्त्रविशारदैः ।
( हठयोग० १ । १८ )
हठयोगप्रदीपिका का कथन शिवसंहिता-सम्मत है । नियम-पालन के सम्बन्ध
में भगवान् शिव का स्पष्ट आदेश है कि सिद्धान्तग्रन्थों का श्रवण करना चाहिये ।
परमेश्वर सर्वव्यापक का नाम-संकीर्तन करना चाहिये, शुभ को ही कानों से सुनना
चाहिये, धृति, क्षमा, तप, शौच और लज्जा का ध्यान रखना चाहिये, गुरु का
सेवन करना चाहिये । वैराग्य भाव से घर में रहना चाहिये ।
सिद्धान्तश्रवणं नित्यं वैराग्यगृहसेवनम् ।
नामसङ्कीर्तनं विष्णोः सुसादश्रवणं परम् ॥
धृतिः क्षमा तपः शौचं ह्रीर्मतिगुरुसेवनम् ।
सदैतांश्च परं योगी नियमांश्च समाचरेत् ॥
( शिवसंहिता ३।४१-४२ )
इस सिद्धसिद्धान्तपद्धति रचना में गोरखनाथजी ने दस नियमों को ध्यान में
रख कर उन्हें पाँच प्रकार के लक्षित किये हैं । एकान्तवास, उदासीनता, यथा-
प्राप्ति संतुष्टि, वैरत्याग, और गुरुचरणाश्रय । एकान्तवास का अभिप्राय है जन-
सम्पर्क से दूर रह कर योगमठ आदि के वातावरण में कुटी का निर्माण कर उसमें
निवास करते हुए विषय-भोग में आसक्त न होना। सर्वथा निःसंग रहना ।
उदासीन और द्वन्द्वों में तटस्थ रहकर निःस्पृह भाव से साधन में तत्परता ही
उदासीनता है । शत्रु और मित्र में समान भाव रखकर मन में कभी राग-द्वेष
न उत्पन्न होने देना ही वैर का अभाव है । जो कुछ भी प्राप्त हो जाय, उसी में
सन्तुष्ट और प्रसन्न रहना यथाप्राप्ति-संतुष्टि है और गुरु के प्रसाद — प्रसन्नता से ही
उनकी सेवा में प्रवृत्त रहने से योगसाधक को स्वरूपावस्थान की प्राप्ति होती है ।
एकान्तवास, निःसंगता के सम्बन्ध में श्रीमद्भगवद्गीता का कथन है—
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥
( गीता ६।१० )
मन और इन्द्रियों सहित शरीर को वश में रखने वाला, आशारहित और
संग्रहरहित योगी को अकेला ही एकान्त स्थान में निवास कर आत्मा को निरन्तर
परमात्मा में लगाना चाहिये । गीता के ही बारहवें अध्याय के १८ वें, श्लोक के-
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ७१